UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods (समाजशास्त्र-अनुसंधान पद्धतियाँ)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वैज्ञानिक पद्धति का प्रश्न विशेषतः समाजशास्त्र में क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर
समाजशास्त्र एक विज्ञान है क्योंकि इसमें वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है। समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग का प्रश्न इसलिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कुछ विद्वान् इस विषय को विज्ञान मानने से इंकार करते हैं। वे समझते हैं कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के बारे में उन्हें अपने अनुभवों के द्वारा ही काफी ज्ञान प्राप्त है। वास्तव में ऐसा नहीं है। जो ज्ञान हमें अपने अनुभवों से मिलता है जरूरी नहीं है कि वह वैज्ञानिक ज्ञान ही हो। उदाहरणार्थ-मित्रता या धर्म या बाजारों में मोल-भाव करने जैसी सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन करते समय समाजशास्त्री केवल दर्शकों का अवलोकन ही नहीं करते अपितु इसमें सम्मिलित लोगों की भावनाओं तथा विचारों को भी जानना चाहते हैं। समाजशास्त्री विश्व को उनकी आँखों से देखना चाहते हैं। विभिन्न संस्कृतियों में लोगों के लिए मैत्री का अर्थ क्या है? जब कोई व्यक्ति विशेष अनुष्ठान करता है तो किस प्रकार के धार्मिक विचार उसके मन में आते हैं? एक दुकानदार तथा ग्राहक बेहतर मूल्य पाने के लिए शब्दों तथा भावभंगिमाओं को परस्पर कैसे समझते हैं? ऐसे प्रश्नों का उत्तर केवल वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ही दिया। जा सकता है।

प्रश्न 2.
सामाजिक विज्ञान में विशेषकर समाजशास्त्र जैसे विषय में ‘वस्तुनिष्ठता के अधिक जटिल होने के क्या कारण हैं?
उत्तर
समाजशास्त्रीय अध्ययनों में प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति प्रामाणिकता लाना कठिन है। समाज विज्ञानों के नियम प्राकृतिक विज्ञानों के नियमों की भाँति अटल नहीं होते, वे तो सामाजिक व्यवहार के संबंध में संभावित प्रवृत्ति को प्रकट करते हैं। ऐसी स्थिति के लिए अनेक कारक उत्तरदायी हैं; जैसे-सामाजिक प्रघटना का स्वभाव, ठोस मापदंडों को विकसित न होना आदि। इन्हीं कारणों में एक प्रमुख समस्या वस्तुनिष्ठता की भी है। किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन एवं अनुसंधान की सफलता की। पूर्वापेक्षित शर्त वस्तुनिष्ठता है। इसके अभाव में अनुसंधान के द्वारा प्राप्त निष्कर्षों की विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है। यही कारण है कि समाजशास्त्र में प्रारंभ से ही इस समस्या पर विचार किया जाता रहा है। वस्तुनिष्ठता का अभिप्राय घटना का यथार्थ या वास्तविक रूप में अर्थात् उसी रूप, में, जिसमें वे हैं, वर्णन करना है। यह एक तरह से वैज्ञानिक भावना है जो अनुसंधानकर्ता को उसके पूर्व दृष्टिकोणों से उसके अध्ययन को प्रभावित करने से रोकती है। यदि कोई अनुसंधानकर्ता किसी घटना का वर्णन उसी रूप में करता है जिसमें कि वह विद्यमान है, चाहे उसके बारे में अनुसंधानकर्ता के विचार कुछ भी क्यों न हों, तो हम इसे वस्तुनिष्ठ अध्ययन कह सकते हैं।

सामाजिक विज्ञान में; विशेषकर समाजशास्त्र जैसे विषय में ‘वस्तुनिष्ठता के अधिक जटिल होने के अनेक कारण हैं। एक तो अनुसंधानकर्ता स्वयं अपने मूल्य रखता है तथा उसका अध्ययन उसके मूल्यों एवं पूर्वाग्रहों द्वारा प्रभावित होता है। दूसरे, सामाजिक घटनाएँ जटिल होती हैं तथा उनका तटस्थ रूप से अध्ययन करना सम्भव नहीं है। कुछ विद्वानों (जैसे-मैक्स वेबर) , का कहना है कि सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं की प्रकृति ही ऐसी है कि इनका पूर्ण रूप से वस्तुनिष्ठ अध्ययन किया। ही नहीं जा सकता, जबकि अनेक अन्य विद्वानों (जैसे-दुखम) का विचार है कि समाजशास्त्रीय अध्ययनों में वस्तुनिष्ठता रखना सम्भव है। दुर्णीम ने इस बात का दावा ही नहीं किया अपितु धर्म, श्रम-विभाजन एवं आत्महत्या जैसे सामाजिक तथ्यों का वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने में सफलता भी प्राप्त की; परंतु फिर भी आज अनेक विद्वान यह मानते हैं कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति प्राकृतिक घटनाओं की प्रकृति से भिन्न है जिसके कारण इनको पूर्ण वस्तुनिष्ठ अध्ययन सम्भव नहीं है। हाँ, अनुसंधानकर्ता अनेक सावधानियों का प्रयोग कर अपने विचारों के प्रभावों अर्थात् व्यक्तिनिष्ठता या व्यक्तिपरकता को कम-से-कम करने का प्रयास कर सकता है।

प्रश्न 3.
वस्तुनिष्ठता को प्राप्त करने के लिए समाजशास्त्री को किस प्रकार की कठिनाइयों और प्रयत्नों से गुजरना पड़ता है?
उत्तर
प्रत्येक विज्ञान अपनी विषय-वस्तु का अध्ययन वस्तुनिष्ठ रूप से करने का प्रयास करता है, परंतु सामाजिक घटनाओं की प्रकृति के कारण समाजशास्त्र जैसे विषय में वस्तुनिष्ठता रख पाना एक कठिन कार्य है। इसमें आने वाली प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

  1. समस्या का चयन मूल्य-निर्णयों द्वारा प्रभावित–सामाजिक अनुसंधान में वस्तुनिष्ठता न रख पाने का सर्वप्रथम कारण अनुसंधान समस्या का चयन है जो कि अंवेषणकर्ता के मूल्यों तथा रुचियों द्वारा प्रभावित होता है। समस्या का चयन सदैव मूल्यों से संबंधित होता है और इसीलिए सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं को पूर्ण रूप से वस्तुनिष्ठ अथवा वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव नहीं है।
  2. अध्ययन से तटस्थता असंभव–सामाजिक अनुसंधान में जब हम व्यक्तियों एवं समूहों का अध्ययन करते हैं तो स्वयं एक सामाजिक प्राणी होने के कारण हम अध्ययन से अपने आप को तटस्थ अथवा पृथक् नहीं रख पाते। प्राकृतिक विज्ञानों में ऐसा इसलिए संभव हो जाता है क्योंकि उनमें जड़ या निर्जीव वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। स्वयं सामाजिक समूह, विशेष जाति एवं संप्रदाय का सदस्य होने के कारण अनुसंधानकर्ता का पक्षपात या किसी विशेष बात की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही है; अतः सामाजिक विज्ञानों में निष्कर्षों के अनुसंधानकर्ता की मनोवृत्तियों या मूल्यों द्वारा प्रभावित होने की संभावना अधिक होती है।
  3. बाह्य हितों द्वारा बाधा–सामाजिक विज्ञानों में वस्तुनिष्ठता से संबंधित तीसरी बाधा अनुसंधानकर्ता के बाह्य हित हैं। जब वह अपने समूह का अध्ययन करता है तो बहुत-सी बातों की, जिन्हें वह अनुचित मानता है, उपेक्षा कर देती है। दूसरी ओर, जब वह किसी दूसरे समूह को अध्ययन करता है तो वह ऐसी बातों की ओर अधिक ध्यान देता है। इससे अध्ययन की वस्तुनिष्ठता प्रभावित होती है।
  4. सामाजिक घटनाओं की प्रकृति-सामाजिक घटनाओं की प्रकृति भी सामाजिक विज्ञानों में वस्तुनिष्ठ अध्ययनों में एक बाधा है, क्योंकि इनकी प्रकृति गुणात्मक होती है और कई बार अनुसंधानकर्ता को समूह के सदस्यों की मनोवृत्तियों, मूल्यों एवं आदर्शों आदि का अध्ययन करना पड़ता है। इसीलिए उसके लिए परिशुद्ध एवं यथार्थ रूप में घटनाओं का निष्पक्ष अध्ययन . करना सम्भव नहीं रह पाती।
  5. संजातिकेंद्रवाद–अनुसंधानकर्ता स्वयं एक सामाजिक प्राणी है तथा वह किसी विशेष जाति, प्रजाति, वर्ग, लिंग समूह का सदस्य होने के नाते विभिन्न मानवीय क्रियाओं एवं सामाजिक पहलुओं के बारे में अपने विचार एवं मूल्ये रखता है। उसके ये विचार एवं मूल्य उसके अध्ययन को प्रभावित करते हैं। कुंडबर्ग (Lundberg) के अनुसार अनुसंधानकर्ता के नैतिक मूल्य का उसके अध्ययन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

उपर्युक्त बाधाओं के अतिरिक्त अनेक अन्य ऐसे कारण भी हैं जो समाजशास्त्र जैसे सामाजिक विज्ञानों में होने वाले अध्ययनों में पक्षपात या अभिनति (Bias) लाते हैं। अभिनति के ऐसे प्रमुख स्रोत निम्नांकित हैं—

  1. अनुसंधानकर्ता के अपने मूल्यों से संबंधित अभिनति,
  2. सूचनादाता की अभिनति,
  3. निदर्शन के चुनाव में अभिनति,
  4. सामग्री संकलन करने की दोषपूर्ण प्रविधियाँ तथा
  5. सामग्री के विश्लेषण एवं निर्वचन में अभिनति।

प्रश्न 4.
प्रतिबिंबता का क्या तात्पर्य है तथा यह समाजशास्त्र में क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर
समाजशास्त्र में अनुसंधानकर्ता के अपने मूल्यों एवं पूर्वाग्रहों द्वारा प्रभावित होने तथा इस नाते वस्तुनिष्ठ अध्ययन न कर पाने की समस्या का समाधान करने के अनेक उपाय खोजने का प्रयास किया गया है। इसकी पहली पद्धति अनुसंधान के विषय के बारे में अपनी भावनाओं तथा विचारों को लगातार कठोरता से जाँचना है। अधिकांशत: समाजशास्त्री अपने कार्य के लिए किसी बाहरी व्यक्ति के दृष्टिकोण को ग्रहण करने का प्रयास करते हैं वे अपने आपको तथा अपने अनुसंधान कार्यों को दूसरों की आँखों से देखने का प्रयास करते हैं। इसी पद्धति को प्रतिबिंबता’ अथवा ‘स्व-प्रतिबिंबता’ कहा जाता है। समाजशास्त्री लगातार अपनी मनोवृत्तियों तथा मतों की स्वयं जाँच करते रहते हैं। वह अपने अनुसंधान से संबंधित अन्य व्यक्तियों के मतों को सावधानीपूर्वक अपनाते रहते हैं। प्रतिबिंबता का एक व्यावहारिक पहलू किसी व्यक्ति द्वारा किए जा रहे कार्य का सावधानीपूर्वक वर्णन करना है। भले ही समाजशास्त्री वस्तुनिष्ठ होने का भरसक प्रयास क्यों न करें, तथापि अवचेतन पूर्वाग्रह की संभावना सदैव बनी रहती है। पाठकों को अपने पूर्वाग्रह की संभावना से सचेत कर उन्हें मानसिक रूप से इसकी क्षतिपूर्ति करने के लिए तैयार किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
सहभागी प्रेक्षण के दौरान समाजशास्त्री और मानवविज्ञानी क्या कार्य करते हैं?
उत्तर
समाजशास्त्र तथा सामाजिक मानवशास्त्र में सहभागी अवलोकन (प्रेक्षण) एक लोकप्रिय पद्धति है जिसके द्वारा उस समाज, संस्कृति तथा उन लोगों के बारे में सीखने का प्रयास किया जाता है। जिनका कि अनुसंधानकर्ता अध्ययन कर रहा होता है। सहभागी अवलोकन के दौरान अनुसंधान के विषय के साथ लंबी अवधि की अंतक्रिया सम्मिलित होती है। अनुसंधानकर्ता कई महीने या लगभग एक वर्ष तक उन लोगों के बीच उनकी तरह बनकर रहता है जिनका वह अध्ययन कर रहा होता है। इस अवधि में वह उनका विश्वास प्राप्त करने का प्रयास करता है ताकि उसे ‘बाहरी व्यक्ति’ न माना जाए। यदि अध्ययन कर रहे लोगों को अनुसंधानकर्ता पर पूर्ण विश्वास न हो तो वे उसे सही सूचनाएँ प्रदान नहीं करते हैं। सहभागी अवलोकन का लक्ष्य समुदाय के जीने के संपूर्ण तरीके सीखना होता है। सहभागी अवलोकन को क्षेत्रीय कार्य भी कहा जाता है।

प्रश्न 6.
एक पद्धति के रूप में सहभागी प्रेक्षण की क्या-क्या खूबियाँ और कमियाँ हैं?
उत्तर
अध्ययन की किसी अन्य पद्धति की भॉति सहभागी प्रेक्षण की कुछ खूबियाँ भी हैं तथा कुछ कमियाँ भी। एक पद्धति के रूप में सहभागी प्रेक्षण की प्रमुख खूबियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. सूक्ष्म रूप से घटना का अध्ययन–सहभागी प्रेक्षण में अनुसंधानकर्ता समुदाय के सदस्यों के साथ घुल-मिल जाता है, इसलिए यह प्रविधि सामाजिक घटनाओं का प्रत्यक्ष तथा सूक्ष्म रूप से गंभीरता से अध्ययन करती है। प्रेक्षणकर्ता को समूह की सदस्यता ग्रहण करने में ही अनेक महीने लग जाते हैं। वह घटनाओं को धैर्यपूर्ण ढंग से समझ सकता है।
  2. समूह के सदस्यों का सहयोग–सहभागी प्रेक्षण में अनुसंधानकर्ता समूह में काफी देर तक रहता है तथा उसका सदस्य बन जाता है। इसलिए अध्ययन-कार्य में उसे समूह के सदस्यों का सहयोग प्राप्त हो जाता है।
  3. विश्वसनीय सूचनाओं की प्राप्ति-सहभागी प्रेक्षण में निरीक्षणकर्ता व्यक्तिगत रूप से समुदाय का सदस्य रहता है। इसलिए समुदाय से संबंधित जो भी सूचनाएँ’ वह प्राप्त करता है वे विश्वसनीय होती हैं।
  4. विधि की सरलता सहभागी प्रेक्षण विधि किसी समुदाय या समूह का अध्ययन करने की | सरलतम विधि है, जिमसें किसी प्रकार का कोई अपव्यय नहीं होता।
  5. सूचनाओं की परीक्षा–सहभागी प्रेक्षण में जो सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं, उनकी परीक्षा कभी भी की जा सकती है। इसमें केवल सूचनाओं का संकलन ही सम्भव नहीं है, अपितु उनके अर्थ के संबंध में भी जानकारी प्राप्त होती है।
  6. रीति-रिवाजों का ज्ञान–सहभागी प्रेक्षण में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह के सदस्यों के बीच जाकर बस जाता है, जिससे समूह के रीति-रिवाजों का अनुसंधानकर्ता को पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है। यह ज्ञान उसे सामाजिक घटनाओं को समझने में सहायता प्रदान करता है।

एक पद्धति के रूप में सहभारी प्रेक्षण की प्रमुख कमियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. व्ययशील पद्धति–सहभागी प्रेक्षण एक खर्चीली पद्धति है, जिसमें अनुसंधानकर्ता को समूह का सदस्य बनने के लिए काफी समय सदस्यों का विश्वास प्राप्त करने में ही लग जाता है। अनुसंधानकर्ता को समस्या का अध्ययन करने के लिए अधिक समय और धन लगाना पड़ता है।
  2. अनुसंधानकर्ता पर निर्भरता-सहभागी प्रेक्षण की सफलता अनुसंधानकर्ता पर आधारित होती है; क्योंकि इसमें केवल एक ही व्यक्ति अनुसंधानकर्ता के रूप में कार्य करता है। यदि वह समूह के सदस्यों का ठीक प्रकार से विश्वास प्राप्त नहीं कर पाता तो वह अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफल नहीं हो सकता।
  3. वस्तुनिष्ठता का अभाव-सहभागी प्रेक्षण में तटस्थता का अभाव पाया जाता है, क्योंकि अनुसंधानकर्ता स्वयं ही समूह का सदस्य बन जाता है। वह निष्पक्ष भाव से समस्या का अध्ययन नहीं कर सकता। सहभागी प्रेक्षणकर्ता का समूह के साथ अनेक प्रकार का भावात्मक लगाव भी हो जाता है जो अध्ययन एवं प्रेक्षणकर्ता की वस्तुनिष्ठता को कम कर देता है।
  4. समस्याओं के विश्लेषण का अभाव-सहभागी प्रेक्षण में अनुसंधानकर्ता समुदाय का सदस्य। होने के कारण समुदाय की अनेक समस्याओं से परिचित हो जाता है, इसलिए बहुत-सी समस्याओं का विश्लेषण ही नहीं कर पाता। अनुसंधानकर्ता का प्रेक्षण उचित स्तर को नहीं रहता; क्योंकि वह समूह की विपत्तियों, प्रसन्नताओं तथा लड़ाई-झगड़ों से निरंतर प्रभावित होता रहता है, इसलिए उनका विश्लेषण भी नहीं कर पाता।
  5. पूर्ण सहभागिता संभव नहीं-बाहरी सदस्य के लिए प्रेक्षणित समूह अथवा समुदाय में पूर्ण रूप से भाग लेना सम्भव नहीं है क्योंकि बाहरी व्यक्ति होने के नाते उसे सदा संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। भिन्न संस्कृति होने के कारण भी समुदाय के सदस्यों में घुल-मिल जाना तथा ‘दिल की धड़कनें एक कर लेना’ सरल नहीं है। कुछ विद्वानों का कहना है कि समूह के सदस्यों * के विभिन्न प्रकार के कार्यों में सहायता करके, उनको अनिवार्य वस्तुएँ बाँटकर, उन्हें प्रभावित करके उनका विश्वास प्राप्त किया जा सकता है। परंतु यदि ऐसा किया जाता है तो प्रेक्षणकर्ता वास्तविक व्यवहार का अध्ययन ने करके कृत्रिम व्यवहार का अध्ययन ही कर पाएगा, क्योंकि इसमें पक्षपातपूर्ण अध्ययन हो सकता है।
  6. अनेक परिस्थितियों में सहभागिता असंभव–अनेक परिस्थितियाँ ऐसी हैं, जिनका सहभागी प्रेक्षण द्वारा अध्ययन नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रेक्षणकर्ता के लिए उनकी सदस्यता ग्रहण करना संभव नहीं है। उदाहरणार्थ-अगर हमें डाकूओं का अध्ययन करना है अथवा जेल के कैदियों या पुलिस के अफसरों अथवा लोकसभा के सदस्यों का अध्ययन करना है तो न तो हम डाकू बन सकते हैं, न जेल के कैदी, न पुलिस अफसर और न लोकसभा के सदस्य। इसलिए सहभागी प्रेक्षण का प्रयोग केवल सीमित परिस्थिति में ही किया जा सकता है।
  7. लघु समूहों का अध्ययन–सहभागी प्रेक्षण तभी प्रभावशाली हो सकता है जबकि समूह अथवा | समुदाय का आकार छोटा हो। विस्तृत क्षेत्र होने पर इस प्रविधि का प्रयोग करना संभव नहीं है; अतः क्षेत्र की दृष्टि से भी इसकी उपयोगिता सीमित है।
  8. भूमिका संतुलन की समस्या सहभागी प्रेक्षण में प्रेक्षणकर्ता को एक वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ता तथा समूह के सक्रिय सदस्य की दो भिन्न प्रकार की भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं। ऐसा अनिवार्य नहीं है कि वह इन विपरीत भूमिकाओं में संतुलन रख ही पीएं। यदि संतुलन नहीं रख पाता तो अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

उपर्युक्त कमियों के बावजूद सहभागी प्रेक्षण प्राचीन समाजों तथा जनजातियों के अध्ययन में लोकप्रिय तथा सबसे अधिक प्रचलित प्रविधि बनी हुई है।

प्रश्न 7.
सर्वेक्षण पद्धति के आधारभूत तत्त्व क्या हैं? इस पद्धति का प्रमुख लाभ क्या है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण अब तक ज्ञात सबसे अच्छी समाजशास्त्रीय पद्धति मानी जाती है। सर्वेक्षण आधुनिक सार्वजनिक जीवन का एक सामान्य हिस्सा बन गया है। सर्वेक्षण में संपूर्ण तथ्यों का पता लगाने का प्रयास किया जाता है। यह किसी विषय पर सावधानीपूर्वक चयन किए गए लोगों के प्रतिनिधि समग्र से प्राप्त सूचना का व्यापक दृष्टिकोण होता है। इसमें उत्तरदाता अनुसंधानकर्ता के समूह द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देते हैं। उत्तरदाताओं का चयन निदर्शन (प्रतिदर्श) द्वारा किया जाता है तथा इसीलिए इसे कई बार ‘प्रतिदर्श सर्वेक्षण’ भी कहा जाता है। प्रतिदर्श सर्वेक्षण पद्धति के प्रमुख लाभ निम्न प्रकार हैं-

  1. परिमाणात्मक सूचनाएँ-सामाजिक सर्वेक्षण विस्तृत सामग्री के संबंध में परिमाणात्मक सूचनाएँ प्रदान करने का मुख्य स्रोत है जिसमें सांख्यिकीय प्रविधियों को भी विस्तार से लागू किया जा सकता है।
  2. गुणात्मक सूचनाएँ-सामाजिक सर्वेक्षण परिमाणात्मक सूचनाओं के साथ-साथ गुणात्मक सूचनाओं के संकलन का भी एक अति उपयोगी साधन है।
  3. वैज्ञानिक परिशुद्धता-सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त परिणाम एवं निष्कर्ष सूक्ष्म, उपयुक्त और विश्वसनीय होते हैं क्योंकि इसमें वैज्ञानिकता का गुण पाया जाता है अर्थात् संपूर्ण सर्वेक्षण वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किया जाता है।
  4. वस्तुनिष्ठता-सामाजिक सर्वेक्षण में क्योंकि सामान्यत: अनेक सर्वेक्षणकर्ता कार्यरत होते हैं। अतः अध्ययन को उनके व्यक्तिगत विचारों एवं मनोभावनाओं द्वारा प्रभावित होने या किसी प्रकार का पक्षपात होने की संभावना बहुत कम होती है। वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करने तथा विषय-वस्तु से प्रत्यक्ष एवं निकट का संपर्क होने के कारण सर्वेक्षण द्वारा एकत्रित सूचनाएँ अधिक वस्तुनिष्ठ होती हैं।
  5. उपकल्पना का निर्माण एवं परीक्षण सामाजिक सर्वेक्षण उपकल्पना या प्रकल्पना के निर्माण में सहायता देते हैं तथा इतना ही नहीं अपितु इनसे संबंधित आँकड़े एकत्रित करके उनकी प्रामाणिकता की जाँच करने में भी सहायक होते हैं।

प्रश्न 8.
प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व चयन के कुछ आधार बताएँ।
उत्तर
प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व से अभिप्राय किसी विस्तृत समूह के एक अपेक्षाकृत लघु प्रतिनिधि से है। यह वह प्रतिदर्श है जिसमें समान संभावना या संयोग को महत्त्व दिया जाता है। दैव प्रतिदर्श (Random Sampling) संभावित प्रतिदर्श का प्रमुख प्रकार है। दैव प्रतिदर्श वह प्रतिदर्श है जिसमें समग्र की प्रत्येक इकाई के चुने जाने की संभावना या संयोग (Chance) एक समान होता है; अत: यह प्रतिदर्श पक्षपातरहित एवं समग्र का प्रतिनिधित्व करने वाला होता है। गुड एवं हैट (Goode and Hatt) के अनुसार, “दैव प्रतिदर्श में समग्र की इकाइयों को इस प्रकार से क्रमबद्ध किया जाता है कि चुनाव प्रक्रिया समग्र की प्रत्येक इकाई को चयन का समान अवसर प्रदान करती है। प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व चयन के प्रमुख आधार अग्रांकित हैं-

  1. लाटरी पद्धति–यदि समग्र का आकार छोटा है तो सभी इकाइयों, को एक-से काजज की छोटी-छोटी पर्चियों पर लिखकर किसी ड्रम इत्यादि में डालकर हिलाया जाता है ताकि, पर्चियाँ आपस में इस प्रकार मिल जाएँ कि पक्षपात की कोई संभावना न रहे। फिर आँख बंद करके या किसी बच्चे की सहायता से एक-एक पर्ची निकाली जाती है। जितनी निदर्शने चाहिए उतनी पर्चियाँ एक-एक करके निकाल ली जाती हैं। कार्ड या निकट पद्धति भी इसी को ही कहते हैं, परंतु इसमें प्रत्येक पर्ची निकालने के बाद डुम को काफी हिलाया जाता है।
  2. ग्रिड पद्धति–इसे भौगोलिक क्षेत्र के किसी भाग को चुनने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। प्रस्तावित क्षेत्र पर एक पारदर्शी प्लेट रखी जाती है जिस पर विभिन्न भागों को संख्याओं के रूप में दिखाया जाता है। निदर्शन द्वारा संख्या एवं क्षेत्र का चयन किया जाता है।
  3. दैव संख्या सारणी पद्धति-जब समग्र का आकार बड़ा होता है तो लाटरी पद्धति को अपनाना एक कठिन कार्य हो जाता है; अतः दैव संख्या सारणी का प्रयोग किया जाता है। इन संख्याओं को वैज्ञानिक पद्धति द्वारा निर्धारित किया जाता है। सामान्यतः टिप्पेट (Tippet) अथवा फिशर | एवं येट्स (Fisher and Yates) की देव संख्या सारणी का प्रयोग किया जाता है। इस सारणी द्वारा निर्धारित संख्या इकाईयों का चयन किया जाता है। इसमें भी प्रत्येक इकाई चुने जाने की बराबर संभावना होती है।

प्रश्न 9.
सर्वेक्षण पद्धति की कुछ कमजोरियों का वर्णन करें।
उत्तर
सर्वेक्षण पद्धति की निम्नलिखित प्रमुख कमजोरियाँ हैं-

  1. अमूर्त घटनाओं का अध्ययन असंभव-सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा केवल अवलोकनीय घटनाओं को ही अध्ययन संभव हो पाता है; हम इससे अमूर्त घटनाओं या किसी प्रकार की आंतरिक सूचना प्राप्त नहीं कर सकते हैं। विचारों, विश्वासों एवं व्यवहारों की जटिलता को समझने में अनेक विद्वानों ने सामाजिक सर्वेक्षणों को अनुपयुक्त बताया है।
  2. अत्यधिक समय एवं धन-सामाजिक सर्वेक्षण हेतु अत्यधिक समय एवं धन की आवश्यकता होती है। विविध प्रकार के साधनों (जैसे–अनुसूचियों, प्रश्नावलियों, साक्षात्कार, सांख्यिकीय विश्लेषण आदि) के प्रयोग के कारण सामाजिक सर्वेक्षण में पैसा ही अधिक खर्च नहीं होता अपितु अनेक सर्वेक्षण कई-कई साल तक चलते रहते हैं।
  3. निदर्शन त्रुटि–सामान्यतः निदर्शन सर्वेक्षणों में निदर्शन त्रुटि की संभावना अधिक होती है। क्योंकि बड़े एवं व्यापक स्तर पर होने वाले सर्वेक्षणों में निदर्शन की विश्वसनीयता की जाँच कराना एक कठिन कार्य होता है।
  4. अवास्तविक सूचनाएँ-सामाजिक सर्वेक्षण के अंतर्गत यह संभावना अधिक रहती है कि उत्तरदाता अपनी वास्तविक स्थिति से हटकर समाज द्वारा स्वीकृत मूल्यों एवं मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए यथार्थ सूचनाएँ न देकर गलत सूचनाएँ दे। सर्वेक्षण में व्यक्तिगत भिन्नता के कारण भी निष्कर्षों में पक्षपात हो सकता है।
  5. अध्ययन का सीमित क्षेत्र–सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा किए जाने वाले अध्ययनों का क्षेत्र सीमित होता है, जिससे कई बार सामान्यीकरण करना तक कठिन हो जाता है। किसी एक सर्वेक्षण द्वारा हम किसी समस्या या समूह के एक ही पहलू या भाग का अध्ययन कर सकते हैं।
  6. पर्याप्त ज्ञान एवं प्रशिक्षण सामाजिक सर्वेक्षण के संचालन के लिए पर्याप्त ज्ञान एवं विशेषीकरण की आवश्यकता होती है। यदि बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण किया जा रहा है तो उनके (सर्वेक्षकों के) प्रशिक्षण की समस्या आ सकती है क्योंकि प्रशिक्षित सर्वेक्षक बहुत कम मिलते हैं।
  7. सूचनाएँ सँभालने की समस्या सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा काफी मात्रा में सूचनाओं या आँकड़ों का संकलन किया जाता है परंतु संकलन करने के पश्चात् इन्हें सँभालना तथा इनका समुचित प्रयोग करना एक कठिन कार्य हो जाता है। यदि सूचनाएँ गुणात्मक प्रकृति की हैं तो यह कार्य और भी कठिन हो जाता है।
  8. सूचनाएँ प्राप्त करने में कठिनाई-सामाजिक सर्वेक्षण में सूचनाएँ एकत्रित करना भी एक कठिन कार्य है। यदि अनुसंधान उपकरण जैसे कि अनुसूची अधिक विस्तृत एवं लंी है तो सूचनादाता उत्तर देते-देते उकता जाते हैं और बिना सोचे-समझे उत्तर देने लगते हैं। साथ ही, युवा अविवाहित लड़कियों तथा नवविवाहित स्त्रियों तक पहुँच पाना और उनसे सूचनाएँ एकत्रित कर पाना भी एक कठिन कार्य है।

प्रश्न 10.
अनुसंधान पद्धति के रूप में साक्षात्कार के प्रमुख लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर
साक्षात्कार दो या दो से अधिक व्यक्तियों की आमने-सामने होने वाली एक बैठक है। इसमें एक पक्ष तो साक्षात्कारकर्ता का है, जबकि दूसरा पक्ष एक या अधिक सूचनादाताओं की है। आज इसका प्रयोग निरंतर बढ़ता जा रहा है। अनुसंधान पद्धति के रूप में साक्षात्कार के प्रमुख लक्षण निम्नांकित हैं-

  1. अनुसंधान की प्रविधि-साक्षात्कार सामाजिक अनुसंधान एवं सर्वेक्षणों में प्रयोग की जाने वाली एक प्रविधि है, जिसका उद्देश्य समस्या की प्रकृति के अनुरूप सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने में सहायता प्रदान करना है। यह आँकड़े एकत्रित करने की अपने में पूर्ण प्रविधि है; यद्यपि इसका प्रयोग एक सहायक अथवा पूरक प्रविधि के रूप में भी किया जाता है।
  2. प्रत्यक्ष संपर्क–साक्षात्कार, जैसाकि इसकी परिभाषाओं से ही स्पष्ट है, आमने-सामने की एक बैठक है, जिसमें साक्षात्कारकर्ता एवं सूचनादाता प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करते हैं; अर्थात् आमने-सामने बैठकर समस्या के बारे में वार्तालाप द्वारा साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता से सूचनाएँ एकत्रित करता है।
  3. सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि–साक्षात्कार सामाजिक अन्वेषण एवं सर्वेक्षणों में प्रयोग होने वाली सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि है। आज अधिकांश अध्ययनों से इसे एक स्वतंत्र प्रविधि के रूप में अथवा सहायक या पूरक प्रविधि के रूप में अपनाया जा रहा है।
  4. अधिकतम जानकारी-प्रत्यक्ष या आमने-सामने का संपर्क होने के कारण साक्षात्कार प्रविधि द्वारा साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता से अधिकतम सूचनाएँ एकत्रित कर लेता है। यदि संपर्क ठीक प्रकार से हुआ है तो सूचनादाता समस्या के सभी पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी दे देता है।
  5. प्रमाणिक सूचनाएँ-साक्षात्कार द्वारा एकत्रित सूचनाएँ अधिक प्रमाणित होती हैं। मोजर (Moser) ने अपनी परिभाषा में ही इस तथ्य की महत्ता पर बल दिया है। बड़े सर्वेक्षणों में यह निश्चित रूप से अन्य प्रविधियों की तुलना में अधिक प्रमाणित सूचनाएँ एकत्रित करने में सहायक है।
  6. सभी प्रकार के सूचनादाताओं के लिए उपयोगी–साक्षात्कार एक ऐसी प्रविधि है, जो सभी प्रकार के सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने में सहायक है। इसमें सूचनादाताओं को पढ़ा-लिखा होना अनिवार्य नहीं है (जैसा कि प्रश्नावली में है), अपितु यह सभी प्रकार की पृष्ठभूमि के सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने में सहायक है।

क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप दूसरों को जैसे देखते हैं, उसी तरह अपने आपको भी देख सकते हैं? (क्रियाकलाप 1)
उत्तर
समाजशास्त्र में वस्तुनिष्ठता बनाए रखने के लिए जिन पद्धतियों को अपनाया जाता है उनमें से एक अपने आप को दूसरों की नजरों से देखना है। यह एक प्रकार से अन्य लोगों (जैसे अपने श्रेष्ठ मित्रों, अपने विरोधियों, अपने शिक्षकों आदि) के दृष्टिकोण से अपने आपको देखना है। प्रत्येक छात्र इस पद्धति द्वारा अपना स्वमूल्यांकन कर सकता है अर्थात् यह जान सकता है कि दूसरे उसके बारे में क्या सोचते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि यदि हमें इस बात का आभास हो जाए कि दूसरे हमारे बारे में कोई अच्छी छवि नहीं रखते तो हम अपने आचरण में सुधार लाने का भी प्रयास करते हैं।

प्रश्न 2.
क्षेत्रीय कार्य जिन स्थानों पर हुए हैं उनमें क्या समान है? एक मानवविज्ञानी के लिए इन ‘अनजानी संस्कृतियों में रहना कैसा रहा होगा? उन्होंने क्या-क्या कठिनाइयाँ सहन की होंगी? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
क्षेत्रीय कार्य से अभिप्राय अध्ययन के क्षेत्र में जाकर अनुसंधान संबंधी आँकड़े संकलन करने से है। यह पद्धति सहभागी अवलोकन के रूप में भी हो सकती है अथवा असहभागी अवलोकन के रूप में भी। जेम्स फ्रेजर, इमाईल दुर्णीम तथा मेनिस्लाव मैलिनोव्स्की द्वारा किए गए क्षेत्रीय अध्ययन में सबसे प्रमुख समानता यह रही है कि ऐसे सभी अध्ययन आदिम या जनजातियों से संबंधित हैं। इन अध्ययनों में सहभागी अवलोकन पद्धति का प्रयोग किया गया है। सहभागी अवलोकन पद्धति में जब कोई मानवविज्ञानी जनजातीय संस्कृति में रहता है तो उसे अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसे भाषा समझने, खान-पान तथा जनजातीय लोगों का विश्वास जीतने जैसी अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है। जनजातीय लोग बाहरी लोगों को शक की निगाहों से देखते हैं तथा सरलता से उन पर विश्वास नहीं करते हैं। इसलिए मानवविज्ञानी को पहले कुछ महीने बिना किसी प्रकार का अध्ययन किए इन लोगों का विश्वास प्राप्त करना होता है। कई बार ऐसा करने के लिए मानवविज्ञानी अपने आपको पर्यावरणवादी या संगीतकार या समाज-सुधारक के रूप में भी प्रस्तुत कर सकता है।

प्रश्न 3.
यदि आप गाँव में रहते हैं तो अपने गाँव के बारे में ऐसे व्यक्ति को बताने की कोशिश करें जो वहाँ कभी न गया हो। गाँव में आपके जीवन के वे कौन-से मुख्य लक्षण होंगे जिन्हें आप महत्त्व देना चाहेंगे? (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
गाँव में रहने वाले व्यक्ति के लिए अपने गाँव के बारे में किसी अन्य व्यक्ति को बताने में ज्यादा सोचना नहीं पड़ता है। वह अपने गाँव की भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या, जातीय संरचना, भू-स्वामित्व के प्रतिमान, व्यवसाय, आवास के प्रकार, खेतों में उगाई जाने वाली फसलों, ग्रामीण परिवारों, ग्रामवासियों में पाए जाने वाले पारस्परिक संबंधों, ग्राम पंचायत की गतिविधियों इत्यादि के बारे में विस्तार में बता सकता है। ऐसा करते समय बताए जाने वाले व्यक्ति को यह अहसास होना चाहिए कि उसने वास्तव में गाँव न देखकर भी गाँव की झलक प्राप्त कर ली है। गाँव में कच्चे एवं पक्के दोनों प्रकार के घर पाए जाते हैं। मुख्य सड़क से गाँव तक का रास्ता पक्का या खड्जे वाला हो। सकता है। गलियों में भी दोनों तरफ नालियाँ तथा बीच में खड़ेजा या कच्चा रास्ता हो सकता है। नालियों में प्रायः गंदगी रहती है तथा गलियों में भी नाली का पानी इधर-उधर से बाहर निकला हुआ दिखाई दे सकता है। ग्रामवासी कृषि से संबंधित क्रियाओं पर ही अपना ध्यान अधिक केंद्रित करते हैं। अधिकांश परिवारों की प्रकृति संयुक्त परिवार पद्धति वाली होती है तथा परिवारों का आकार भी अपेक्षाकृत बड़ा होता है। बड़े-बूढ़े छोटों का न केवल समाजीकरण करते हैं, अपतुि प्रत्येक सदस्य पर नियंत्रण भी रखते हैं। प्रत्येक सदस्य का प्रयास यह होता है कि वह कोई ऐसा कार्य न करे जिससे परिवार की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचे। ग्रामवासियों में संबंध प्रत्यक्ष एवं व्यक्तिगत होते हैं तथा उनमें सामुदायिक भावना पाई जाती है। गाँव में विभिन्न जातियों में पाया जाने वाला सामाजिक स्तरीकरण एवं भेदभाव स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। हो सकता है कि विभिन्न जातियों में सेवाओं का विनिमय भी पाया जाता है जिसे समाजशास्त्र में जजमानी व्यवस्था’ कहा जाता है। गाँव में उपलब्ध सुविधाओं का जिक्र भी किया जा सकता है जिससे बताने वाले को पता चल सके कि गाँव किस सीमा तक सार्वजनिक सुविधाओं की दृष्टि से पिछड़े हुए हैं।

प्रश्न 4.
आपने फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों को भी अवश्य देखा होगा। आप इन गाँवों अथवा कस्बों के बारे में क्या सोचते हैं तथा ये आपके गाँव अथवा कस्बे से किस प्रकार भिन्न हैं? क्या आप इनमें रहना पसंद करेंगे? अषमे उत्तर के पक्ष में कारण बताएँ। (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों को यथासंभव वास्तविक गाँव अथवा कस्बे के रूप में दर्शाने का प्रयास किया जाता है। फिर भी, अनेक फिल्मों में अधिकांश दृश्य स्टूडियों में फिल्माए जाते हैं इसलिए कृत्रिम रूप से गाँव एवं कस्बे के दृश्यों को भी दिखाया जा सकता है। इसीलिए अधिकांशतः फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों को जिस रूप में दर्शाया जाता है वह वास्तविक गाँवों एवं कस्बों के वास्तविक रूप से भिन्न होता है। वस्तुत: भारत में गाँव एवं कस्बे भी एक जैसे नहीं हैं। आकार की दृष्टि से वे बड़े, मध्यम अथवा छोटे हो सकते हैं तथा सुविधाओं की दृष्टि से पूर्ण सुविधायुक्त, आंशिक सुविधायुक्त अथवा असुविधायुक्त भी हो सकते हैं। बहुत-से-गाँव नगरीकृत अथवा अर्द्ध-नगरीकृत भी हो सकते हैं। इन गाँवों में अन्य गाँवों की तुलना में अधिक साफ-सफाई एवं सुविधाएँ हो सकती हैं। ऐसे ही खेतों के आकार में भी अंतर हो सकता है। इसी भाँति, कस्बे भी आकार में बड़े, मध्यम एवं छोटे तथा सुविधाओं से दृष्टि से पूर्ण सुविधायुक्त, आंशिक सुविधायुक्त अथवा असुविधायुक्त हो सकते हैं। फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों में प्राय: वास्तविक गाँवों एवं कस्बों से अधिक साफ-सफाई एवं सुविधाएँ दिखाई जाती हैं। कोई भी ग्राम या कस्बे में रहने वाला व्यक्ति यह सोच सकता है कि काश उसका गाँव या कस्बा भी फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों की भाँति होता। न रहने वाला व्यक्ति भी फिल्म से प्रोत्साहित होकर वहाँ रहने की इच्छुक हो सकता है। इस प्रकार, फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँव अथवा कस्बे संदर्भ भी भूमिका भी निभाते हैं।

प्रश्न 5.
अपने समूह में उन सर्वेक्षणों के बारे में चर्चा कीजिए जिनके बारे में आप जानते हैं। (क्रियाकलाप 4)
उत्तर
चुनाव के समय अनेक टेलीविजन चैनलों एवं अनुसंधान संस्थानों द्वारा अलग-अलग अथवा संयुक्त रूप से चुनाव सर्वेक्षण करवाए जाते हैं। यह सर्वेक्षण किसी अन्य समस्या (जैसे भारत में बढ़ती हुई हिंसा, भ्रष्टाचार, महँगाई इत्यादि) को लेकर समाचार-पत्रों या टेलीविजन माध्यमों द्वारा किए गए अन्य लघु सर्वेक्षण भी हो सकते हैं। अभी उत्तराखंड तथा पंजाब विधानसभाओं के लिए चुनाव से संबंधित जो चुनाव सर्वेक्षण किए गए थे उनमें कांग्रेस की पराजय का अनुमान सामने उभरकर आया था। जब मतों की गिनती द्वारा नतीजों की घोषणा की गई तो यह अनुमान काफी सीमा तक सही पाया गया। यदि सर्वेक्षण में सम्मिलित सूचनादाताओं का चयन प्रतिनिधित्व प्रतिदर्श द्वारा किया गया है तो अनुमान सही होने की काफी संभावना बनी रहती है। जब इन चुनाव सर्वेक्षण के परिणाम घोषित किए गए तो इनमें रही सीमांत त्रुटि के बारे में भी विश्लेषकों ने विस्तार से बताया था। चूंकि कुछ सर्वेक्षणों में सम्मिलित सूचनादाताओं का आकार समग्र की दृष्टि से अत्यंत छोटा होता है तथा चयन की पद्धति भी संभावित प्रतिदर्श जैसी नहीं होती, इसलिए इन सर्वेक्षणों के परिणाम त्रुटिपूर्ण भी हो सकते हैं।

प्रश्न 6.
यदि आपके सर्वेक्षण का उद्देश्य यह पता लगाना है कि जिन विद्यार्थियों के अनेक भाई तथा बहन हैं, वे विद्यार्थियों की तुलना में, जिनका एक भाई या बहन (या कोई भी नहीं है, पढाई में अच्छे हैं या बुरे तो आप अपने स्कूल के सभी विद्यार्थियों में से प्रतिनिधि प्रतिदर्श का चयन करने के लिए क्या करेंगे? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
पहले स्कूल में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थियों के बारे में अनेक भाई-बहनों की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया जाएगा। फिर इन विद्यार्थियों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। पहली श्रेणी उन विद्यार्थियों की होगी जिनके अनेक भाई तथा बहन हैं। दूसरी श्रेणी उन विद्यार्थियों की होगी जिनका केवल एक भाई या बहन है अथवा कोई भी बहन-भाई नहीं है। इन दोनों श्रेणियों के विद्यार्थियों के पढ़ाई के स्तर को भी ज्ञात करने का प्रयास किया जाएगा। यदि दोनों श्रेणियों के विद्यार्थियों की संख्या अधिक होगी तो उपयुक्त पद्धति द्वारा प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व चयन करने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए लाटरी पद्धति, ग्रिड पद्धति अथवा दैव संख्या सारणी पद्धति का प्रयोग किया जा सकता है। यदि आप इनमें से किसी एक पद्धति द्वारा उनमें से 10 प्रतिशत छात्राओं के चयन करते हैं तो चयनित प्रतिदर्श को प्रतिनिधि प्रतिदर्श कहा जाएगा।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘डिक्शनरी ऑफ सोशियोलोजी पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क) फेयरचाइल्ड
(ख) लिंडमैन
(ग) वेल्स
(घ) गुड एंड हैट
उत्तर
(क) फेयरचाइल्ड

प्रश्न 2.
अवलोकन में मुख्य रूप से कौन-सी ज्ञानेंद्रिय का प्रयोग किया जाता है?
(क) हाथों को
(ख) कानों का
(ग) आँखों का
(घ) मुंह का
उत्तर
(ग) आँखों का

प्रश्न 3.
‘सोशल डिस्कवरी’ नामक पुस्तक के लेखक हैं-
(क) फेयरचाइल्ड
(ख) मैकाइवर एवं पेज।
(ग) रोबर्ट के० मर्टन
(घ) लिंडमैन
उत्तर
(घ) लिंडमैन

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा साक्षात्कार किसी सामाजिक घटना के कारणों की खोज करने से संबंधित है?
(क) उपचार-संबंधी साक्षात्कार
(ख) कारक-परीक्षक साक्षात्कार
(ग) अनौपचारिक साक्षात्कार
(घ) पुनरावृत्ति साक्षात्कार
उत्तर
(ख) कारक-परीक्षक साक्षात्कार

प्रश्न 5.
अण्डमान निकोबार द्वीपों का अध्ययन किसने किया?
(क) ईवान्स प्रिचार्ड।
(ख) विलियम वाइजर
(ग) रैडक्लिफ ब्राउन
(घ) एस०सी० दुबे
उत्तर
(ग) रेडक्लिफ ब्राउन

प्रश्न 6.
इंडियन विलेज’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क) एस०सी० दुबे
(ख) फेयरचाइल्ड
(ग) एम०एन० श्रीनिवा
(घ) ऑस्कर लेविस
उत्तर
(क) एस०सी० दुबे

प्रश्न 7.
“साक्षात्कार मौखिक रूप से सामाजिक अंतः क्रिया की एक प्रक्रिया है, यह कथन किसका
(क) एम०एन० बसु,
(ख) पी०वी० यंग
(ग) सी०ए० मोजर
(घ) गुड एवं हैट
उत्तर
(घ) गुड एवं हैट

निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अनुसंधानकर्ता को सामाजिक अनुसंधान में विशिष्ट नजरिया किसके द्वारा प्रदान किया जाता है।
उत्तर
अनुसंधानकर्ता को सामाजिक अनुसंधान में विशिष्ट नजरिया पद्धति द्वारा प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 2.
‘पद्धति’ शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से किस अर्थ में किया जाता है?
उत्तर
‘पद्धति’ शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से वैज्ञानिक पद्धति के अर्थ में किया जाता है।

प्रश्न 3.
सामाजिक अनुसंधान में सूचनाएँ किसके द्वारा संकलित की जाती हैं?
उत्तर
सामाजिक अनुसंधान में सूचनाएँ यंत्र या तकनीक द्वारा संकलित की जाती हैं।

प्रश्न 4.
अवलोकने का प्रयोग किस प्रकार की सामग्री के संकलन के लिए किया जाता है?
उत्तर
अवलोकन का प्रयोग प्राथमिक सामग्री के संकलन के लिए किया जाता है।

प्रश्न 5.
अवलोकन में मुख्य रूप से किस ज्ञानेंद्रिय द्वारा सामग्री का संकलन किया जाता है?
उत्तर
अवलोकन में आँखों द्वारा सामग्री का संकलन किया जाता है।

प्रश्न 6.
सामाजिक, प्राकृतिक एवं भौतिक विज्ञानों में सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि कौन-सी है?
उत्तर
सामाजिक, प्राकृतिक एवं भौतिक विज्ञानों में सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि अवलोकन है।

प्रश्न 7.
सहभागी तथा असहभागी अवलोकन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किस विद्वान ने किया था?
उत्तर
सहभागी तथा असहभागी अवलोकन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम लिंडमैन ने किया था।

प्रश्न 8.
‘सर्वेक्षण का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर
‘सर्वेक्षण’ अंग्रेजी के सर्वे शब्द का हिंदी रूपान्तरण है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘ऊपर देखना है।

प्रश्न 9.
किस विद्वान ने सामाजिक घटनाओं के वर्णन को सामाजिक सर्वेक्षण का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बताया है?
उत्तर
मोजर एवं कैल्टन ने सामाजिक घटनाओं के वर्णन को सामाजिक सर्वेक्षण का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बताया है।

प्रश्न 10.
बर्गेस ने सामाजिक सर्वेक्षण के किस उद्देश्य को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना है?
उत्तर
बर्गेस ने रचनात्मक कार्यक्रम बनाने को सामाजिक सर्वेक्षण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य माना है।

प्रश्न 11.
टेलीफोन पर सूचनाएँ संकलित किए जाने वाले सर्वेक्षण को क्या कहा जाता है?
उत्तर
टेलीफोन पर सूचनाएँ संकलित किए जाने वाले सर्वेक्षण को टेलीफोन सर्वेक्षण’ कहा जाता है।

प्रश्न 12.
सामाजिक सर्वेक्षण में मुख्य रूप से किस पद्धति का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण में मुख्य रूप से वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 13.
साक्षात्कार का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर
साक्षात्कार का शाब्दिक अर्थ ‘सूचनादाता के आंतरिक जीवन को देखना है।

प्रश्न 14.
सूचनादाताओं की भावनाओं, अनुभवों, संवेगों तथा मनोवृत्तियों के अध्ययन में कौन-सी प्रविधि सर्वाधिक उपुयक्त है?
उत्तर
साक्षात्कार सूचनादाताओं की भावनाओं, अनुभवों, संवेगों तथा मनोवृत्तियों के अध्ययन में सर्वाधिक उपयुक्त प्रविधि है।

प्रश्न 15.
साक्षात्कार की उपयुक्त परिभाषा लिखिए।
उत्तर
गुड एवं हैट के शब्दों में, “साक्षात्कार मौखिक रूप से सामाजिक अंतक्रिया की एक प्रक्रिया है।”

प्रश्न 16.
वह कौन-सा साक्षात्कार है जो किसी सामाजिक घटना के कारणों की खोज करने से संबंधित है?
उत्तर
वह साक्षात्कार ‘कारक-परीक्षक साक्षात्कार’ कहलाता है।

प्रश्न 17.
वह कौन-सा साक्षात्कार है जो किसी सामाजिक समस्या को दूर करने के उपायों की खोज करने से संबंधित है?
उत्तर
वह साक्षात्कार ‘उपचार-संबंधी साक्षात्कार’ कहलाता है।

प्रश्न 18.
वह कौन-सा साक्षात्कार है, जिसमें अनुसंधानकर्ता सूचनादाता से पूर्वनिर्मित प्रश्न नहीं पूछता है?
उत्तर
वह साक्षात्कार ‘अनौपचारिक साक्षात्कार’ है।

प्रश्न 19.
वह कौन-सा साक्षात्कार है, जिसमें अनुसंधानकर्ता सूचनादाताओं से एक से अधिक बार साक्षात्कार करके सूचना संकलित करता है?
उत्तर
वह साक्षात्कार ‘पुनरावृत्ति साक्षात्कार’ है।।

प्रश्न 20.
मैलिनोव्स्की किसके लिए प्रसिद्ध हैं?
उत्तर
मैलिनोव्स्की ट्रोबियाण्ड द्वीपों में रहने वाले निवासियों के क्षेत्रीय कार्य करने के लिए प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 21.
मैलिनोव्स्की कहाँ के रहने वाले थे?
उत्तर
मैलिनोव्स्की पोलैंड में जन्मे मानवशास्त्री थे जो ब्रिटेन में बसे हुए थे।

प्रश्न 22.
मानवशास्त्रियों ने जनजातियों के अध्ययन हेतु किस पद्धति को अपनाया है?
उत्तर
मानवशास्त्रियों ने जनजातियों के अध्ययन हेतु मुख्य रूप से सहभागी अवलोकन की पद्धति को अपनाया है।

प्रश्न 23.
भारत में क्षेत्रीय कार्य पर आधारित ग्रामीण समाज को समझने वाले किसी एक समाजशास्त्री का नाम लिखिए।
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने क्षेत्रीय कार्य पर आधारित ग्रामीण समाज को समझने का प्रयास किया है। उन्होंने मैसूर के निकट रामपुरा गाँव का अध्ययन किया है।

प्रश्न 24.
एस०सी० दुबे ने किस गाँव का अध्ययन किया है?
उत्तर
एस०सी० दुबे ने आंध्र प्रदेश में सिकंदराबाद के निकट समीरपेट नामक गाँव का अध्ययन किया है।

प्रश्न 25.
प्रतिदर्श किसे कहते हैं?
उत्तर
किसी बड़ी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाले छोटे भाग को प्रतिदर्श कहते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पद्धति किसे कहते हैं?
उत्तर
अध्ययन-वस्तु का ज्ञान प्राप्त करने हेतु जिन निश्चित तरीकों का प्रयोग किया जाता है उन्हें सामाजिक अनुसंधान में पद्धति कहा जाता है।

प्रश्न 2.
स्वाभाविकता के आधार पर नियंत्रित एवं अनियंत्रित अवलोकन में क्या अंतर है?
उत्तर
अनियंत्रित अवलोकन में स्वाभाविक व्यवहार का अवलोकन किया जाता है, जबकि नियंत्रित अवलोकन कृत्रिम होता है क्योंकि यह अस्वाभाविक परिस्थितियों में किया जाता है।”

प्रश्न 3.
पुनरावृत्ति की दृष्टि से नियंत्रित एवं अनियंत्रित अवलोकन में क्या अंतर है?
उत्तर
अनियंत्रित अवलोकन की पुनरावृत्ति नहीं की जा सकती, जबकि नियंत्रित अवलोकन में पुनरावृत्ति सम्भव है।

प्रश्न 4.
पक्षपात की दृष्टि से नियंत्रित एवं अनियंत्रित अवलोकन में क्या अंतर है?
उत्तर
अनियंत्रित अवलोकन में पक्षपात की संभावना रहती है, जबकि नियंत्रित अवलोकन में पक्षपात की कोई संभावना नहीं होती है।

प्रश्न 5.
समय एवं धन की दृष्टि से सामाजिक सर्वेक्षण को क्या दोष है?
उत्तर
समय एवं धन की दृष्टि से सामाजिक सर्वेक्षण का दोष यह है कि इसमें समय भी अधिक लगता है तथा धन भी अधिक व्यय होता है।

प्रश्न 6.
अध्ययन-क्षेत्र की दष्टि से सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में क्या अंतर है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण का अध्ययन-क्षेत्र सीमित होता है, जबकि सामाजिक अनुसंधान का व्यापक होता है।

प्रश्न 7.
प्रकृति के आधार पर सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में क्या अंतर है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण की प्रकृति मूल रूप से व्यावहारिक होती है, जबकि सामाजिक अनुसंधान की प्रकृति मुख्यतया सैद्धांतिक होती है।

प्रश्न 8.
जनगणना किसे कहते हैं?
उत्तर
जनगणना एक व्यापक सर्वेक्षण है जिसमें किसी देश की जनसंख्या का प्रत्येक सदस्य सम्मिलित रहता है।

प्रश्न 9.
वंशावली किसे कहते हैं?
उत्तर
वंशावली से अभिप्राय एक विस्तृत वंशवृक्ष से है जो विभिन्न पीढ़ियों के सदस्यों के पारिवारिक संबंधों को दर्शाता है।

प्रश्न 10.
प्रतिबिंबता किसे कहते हैं?
उत्तर
प्रतिबिंबता से अभिप्राय किसी अनुसंधानकर्ता की उस क्षमता से है जिसमें वह स्वयं का प्रेक्षण और विश्लेषण अन्य लोगों की दृष्टि से करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अवलोकन किसे कहते हैं?
या
अवलोकन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
‘अवलोकन’ का शाब्दिक अर्थ ‘देखना है। इसे ‘निरीक्षण’ भी कहते हैं। अवलोकन, निरीक्षण अथवा प्रेक्षण का सभी प्रकार के विज्ञानों में महत्त्वपूर्ण स्थान है; क्योंकि हम सभी प्रकार की समस्याओं एवं घटनाओं को आँखों से देखकर पहचान सकते हैं। इस प्रकार अवलोकन किसी अध्ययन-वस्तु को निष्पक्ष भाव से देखने की वह प्रणाली है, जिसके द्वारा अनुसंधानकर्ता अध्ययन-वस्तु के संबंध में कुछ ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता है। मोजर के अनुसार, “अवलोकन को सुंदर ढंग से वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल की पद्धति कहा जा सकता है। ठोस अर्थों में अवलोकन में कानों तथा वाणी की अपेक्षा आँखों का प्रयोग होता है।”

प्रश्न 2.
अवलोकन की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
अवलोकन की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. मानव-इंद्रियों, विशेष रूप से आँखों का प्रयोग–अवलोकन में मानव इंद्रियों; विशेष रूप से आँखों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसे ‘आँखों द्वारा देखने की एक कला’ कहा गया है, जिससे अध्ययन-वस्तु से संबंधित प्राथमिक सामग्री का संचय किया जात है। मोजर ने ठीक ही कहा है कि “ठोस अर्थ में अवलोकन में कानों और वाणी की अपेक्षा आँखों का अधिक प्रयोग होता है।’
  2. मूलभूत वैज्ञानिक पद्धति–अवलोकन को एक मूलभूत वैज्ञानिक पद्धति माना गया है; क्योंकि यह प्रत्येक विषय (चाहे वह प्राकृतिक विज्ञान है अथवा सामाजिक विज्ञान) में सामान्य रूप से प्रयोग की जाती है। एक मौलिक पद्धति होने के नाते इसके द्वारा विश्वसनीय सूचनाएँ एकत्रित की जा सकती हैं।

प्रश्न 3.
अनियंत्रित अथवा साधारण अवलोकन किसे कहते हैं?
उत्तर
जब अनुसंधानकर्ता किन्हीं प्राकृतिक अवस्थाओं का अध्ययन करने हेतु कुछ क्रियाओं का निरीक्षण करता है तो वह अपने निरीक्षण कार्य में पूर्ण स्वतंत्र होता है। उसके इस कार्य में किसी बाह्य शक्ति या आंतरिक भावना का कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता। इस प्रकार की स्वतंत्र निरीक्षण विधि में अनुसंधानकर्ता को आंतरिक या बाह्य किसी भी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं होता। इसलिए इस अवलोकन को समाजशास्त्रियों ने ‘अनियंत्रित अवलोकन’ की संज्ञा दी है। इस प्रकार क अवलोकन से अनुसंधानकर्ता अध्ययन-वस्तु से संबंधित सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेता है। पी०वी० यंग ने लिखा है। कि “अनियंत्रित अवलोकनों में जीवन की वास्तविक दशाओं को सावधानीपूर्वक परीक्षा की जाती है। तथा अवलोकित घटना की यथार्थता की जाँच करने अथवा यथार्थता के परीक्षण-हेतु यंत्रों के प्रयोग करने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाता।” अनियंत्रित अवलोकन में घटना का वास्तविक रूप में अध्ययन किया जाता है तथा उस घटना पर अथवा अवलोकनकर्ता पर किसी प्रकार का नियंत्रण रखने का प्रयास नहीं किया जाता है।

प्रश्न 4.
नियंत्रित अथवा व्यवस्थित अवलोकन किसे कहते हैं?
उत्तर
नियंत्रित या व्यवस्थित अवलोकन में अनुसंधानकर्ता पर अनेक नियंत्रण लगे रहते हैं। यह नियंत्रण अनेक प्रविधियों के रूप में लगा होता है। दूसरे शब्दों में, नियंत्रित अवलोकन के अंतर्गत अनुसंधानकर्ता को अवलोकन कार्यों में अनेक सीमाओं का ध्यान रखना पड़ता है। ये सीमाएँ सामाजिक घटनाओं के लिए और साथ-ही-साथ अनुसंधानकर्ता के लिए लगाई जाती हैं। क्योंकि सामाजिक घटनाओं में घटना पर नियंत्रण रखना कठिन है, इसलिए अधिकांशतया अनुसंधानकर्ता को स्वयं पर ही नियंत्रण रखना पड़ता है। अनुसंधानकर्ता को अवलोकन करने की योजनाओं को बनाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त अपनी डायरी में अवलोकित तथ्यों को लिखना पड़ता है या उन्हें टेपरिकॉर्डर द्वारा रिकॉर्ड करना पड़ता है। इस प्रकार नियंत्रित अवलोकन में अवलोकनकर्ता को निश्चित सिद्धांतों की सीमाओं में रहकर ही अवलोकन का कार्य करना पड़ता है।

प्रश्न 5.
नियंत्रित तथा अनियंत्रित अवलोकन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
नियंत्रित तथा अनियंत्रित अवलोकन में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं-

  1. नियंत्रित अवलोकन में सामान्यतः यांत्रिक उपकरणों का प्रयोग किया जाता है, जबकि अनियंत्रित अवलोकन में यांत्रिक उपकरणों का प्रयोग नहीं होता है।
  2. नियंत्रित अवलोकन में वास्तविक घटनाओं का अवलोकन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उसमें कृत्रिमता आ सकती है; जबकि अनियंत्रित अवलोकन में वास्तविक घटनाओं का अवलोकन किया जाता है।
  3. नियंत्रित अवलोकन में अनुसंधान का विषय नियंत्रित होता है, जबकि अनियंत्रित अवलोकन में अनुसंधान का विषय नियंत्रणहीन होता है।
  4. नियंत्रित अवलोकन में पहले से ही योजना बना ली जाती है, जबकि अनियंत्रित अवलोकन में पहले से ही कोई योजना नहीं बनाई जाती है।
  5. नियंत्रित अवलोकन का उद्देश्य पूर्वनिर्धारित होता है, जबकि अनियंत्रित अवलोकन का उद्देश्य पूर्वनिश्चित नहीं होता है।
  6. नियंत्रित अवलोकन की पुनरावृत्ति सम्भव होती है,जबकि अनियंत्रित अवलोकन की पुनरावृत्ति नहीं की जा सकती।
  7. नियंत्रित अवलोकन सदैव क्रमबद्ध होता है, किन्तु अनियंत्रित अवलोकन क्रमबद्ध नहीं होता है।

प्रश्न 6.
सहभागी अवलोकन किसे कहते हैं?
उत्तर
इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता उस समूह में जाकर बस जाता है, जिसका वह अध्ययन करता है। अनुसंधानकर्ता समूह की सभी क्रियाओं में सक्रिय भाग लेता है और अपने आप को समूह के सदस्य के रूप में स्वीकार होने योग्य बना देता है। इस प्रकार सहभांगी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह के लोगों से घुलमिलकर समूह की गतिविधियों व समस्या का अध्ययन करता है। किन्तु इस संबंध में अनुसंधानकर्ता को काफी सतर्क रहना पड़ता है। जिससे किसी भी स्तर पर समूह के सदस्यों को उस पर किसी प्रकार की शंका न होने पाए, अन्यथा समूह के सदस्यों के व्यवहार में औपचारिकता एवं कृत्रिमता आ जाएगी और अनुसंधानकर्ता अपने उद्देश्य की पूर्ति करने में असफल रहेगा। गुड तथा हैट के अनुसार, “इस प्रविधि का प्रयोग तभी किया जा सकता है जबकि अवलोकनकर्ता अपने उद्देश्य को प्रकट किए बिना उसी समूह का सदस्य मान लिया जाता है।”

प्रश्न 7.
असहभागी अवलोकन किसे कहते हैं?
उत्तर
इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह का सदस्य नहीं बनता और न वह उस समूह की क्रियाओं में कोई भाग ही लेता है। वह दूर से ही समूह की क्रियाओं का अध्ययन करता है और साथ-ही-साथ समूह के सदस्यों को अपना परिचय देकर यह भी बतला देता है। कि उसका उद्देश्य समूह की क्रियाओं का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष भाव से अध्ययन करना है। इस प्रकार असहभागी अवलोकन सहभागी अवलोकन का विपरीत रूप है। पी०एच० मन के अनुसार, ‘असहभागी अवलोकन एक ऐसी विधि है जिसमें अवलोकन करने वाला अवलोकित से छिपा रहता है।’

प्रश्न 8.
असहभागी अवलोकन के दो प्रमुख गुण बताइए।
उत्तर
असहभागी अवलोकन के दो प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. मितव्ययिता-असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता कम समय में तथा कम खर्च करके अवलोकन का अपना कार्य पूरा करता है; अतः यह सहभागी अवलोकन की तुलना में कम खर्चीला प्रविधि है। अधिकांश अध्ययन इसी प्रविधि से पूरे कर लिए जाते हैं।
  2. निष्पक्षता-असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह का सदस्य नहीं होता इसलिए वह निष्पक्ष भाव से तथा वस्तुनिष्ठ रूप से समस्या का अध्ययन करता है तथा विश्वसनीय आँकड़े एकत्रित करता है। क्योंकि इसमें अवलोकनकर्ता एक तटस्थ प्रेक्षक के रूप में निरीक्षण करता है। तथा समूह के साथ किसी प्रकार का भावात्मक लगाव नहीं रखता; अतः इस प्रकार किया गया अध्ययन अधिक निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ होता है।

प्रश्न 9.
असहभागी अवलोकन के दो प्रमुख दोष बताइए।
उत्तर
असहभागी अवलोकन के दो प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं-

  1. पूर्ण असहभागिता असंभव-असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह के सदस्यों के कार्यों में भाग नहीं लेता है, किंतु विशुद्ध रूप से असहभागी अवलोकन संभव नहीं है। | अनुसंधानकर्ता अवलोकित सदस्यों की क्रियाओं से कुछ-न-कुछ प्रभावित हुए बिना अध्ययन नहीं कर सकता है। इसलिए गुड तथा हैट का कहना है कि पूर्ण सहभागिता की तरह पूर्ण असहभागिता भी संभव नहीं है।
  2. गहन अध्ययन असंभव-असहभागी अवलोकन गहन अध्ययनों में अधिक सहायक नहीं है। क्योंकि इससे अनुसंधानकर्ता समूह में सहभागिता नहीं करता तथा अपेक्षाकृत कम समय के लिए समूह में रहता है, इसलिए वह समस्या के विभिन्न पहलुओं का गहराई से अध्ययन नहीं कर पाता है। इसके द्वारा केवल सतही अध्ययन ही संभव है।

प्रश्न 10.
सामाजिक सर्वेक्षण से आप क्या समझते हैं?
या
सामाजिक सर्वेक्षण का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक अनुसंधान का एक ऐसा तत्त्व है जो कि बड़ी संख्या में व्यक्तियों के विश्वासों, मनोवृत्तियों, विचारधाराओं तथा व्यवहारों के अध्ययन, उन्हें प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों तथा उनके पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण एवं विवेचन करने के लिए तथ्यों के संकलन से संबंधित है। ‘डिक्शनरी ऑफ सोशियोलोजी’ में फेयरचाइल्ड ने एक समुदाय के संपूर्ण जीवन अथवा इसके किसी एक विशेष पक्ष; जैसे–स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन आदि से संबंधित व्यवस्थित एवं पूर्ण तथ्य-विश्लेषण को ही सर्वेक्षण कहा है। वेल्स के अनुसार, “श्रमिक वर्ग की निर्धनता तथा समुदाय की प्रकृति और समस्याओं संबंधी तथ्य खोजने वाला अध्ययन ही सामाजिक सर्वेक्षण है।”

प्रश्न 11.
सामाजिक सर्वेक्षण के दो प्रमुख गुण बताइए।
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण के दो प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. परिमाणात्मक सूचनाएँ–सामाजिक सर्वेक्षण विस्तृत सामग्री के संबंध में परिमाणात्मक सूचनाएँ प्रदान करने का मुख्य स्रोत है, जिसमें सांख्यिकीय प्रविधियों को भी विस्तार से लागू किया जा सकता है।
  2. वैज्ञानिक परिशुद्धता-सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त परिणाम एवं निष्कर्ष सूक्ष्म, उपयुक्त और विश्वसनीय होते हैं, क्योंकि इसमें वैज्ञानिकता का गुण पाया जाता है; अर्थात् संपूर्ण सर्वेक्षण वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 12.
सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में पाई जाने वाली दो समानताएँ बताइए।
उत्तर
सामान्यतः लोग सामाजिक सर्वेक्षण और सामाजिक अनुसंधान को एक ही मान लेते हैं। इस भ्रम का प्रमुख कारण दोनों में पायी जाने वाली कुछ समानताएँ हैं। सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में निम्नलिखित दो समानताएँ पायी जाती हैं

  1. सामाजिक घटनाओं का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण तथा सामाजिक अनुसंधान दोनों के अंतर्गत सामाजिक घटनाओं का अध्ययन किया जाता है।
  2. मानव-व्यवहार को समझना–दोनों का उद्देश्य मानव-व्यवहार की यथार्थता को समझना है। मुख्य रूप से दोनों में मानव-व्यवहार के सामाजिक पक्ष को समझने एवं उसको नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है।

प्रश्न 13.
सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में पाए जाने वाले दो अंतर लिखिए।
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक अनुसंधान एक नहीं हैं। इनमें पाए जाने वाले दो प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं-

  1. अध्ययन-क्षेत्र में अंतर-सामाजिक सर्वेक्षण का अध्ययन-क्षेत्र सीमित होता है, क्योंकि यह . सामान्यतः किसी विशेष व्यक्ति, विशेष समस्या या परिस्थिति से संबंधित होता है; जबकि सामाजिक अनुसंधान का क्षेत्र व्यापक होता है, क्योंकि इसमें सामान्य एवं अमूर्त घटनाओं तक का अध्ययन किया जाता है।
  2. प्रकृति में अंतर–सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान की प्रकृति में काफी अंतर है; क्योंकि पहला (सर्वेक्षण) मूल रूप से व्यावहारिक है, जबकि अनुसंधान की प्रकृति मुख्य रूप से सैद्धांतिक है।

प्रश्न 14.
साक्षात्कार किसे कहते हैं?
या
साक्षात्कार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
साक्षात्कार का अर्थ साक्षात्कारकर्ता तथा उत्तरदाता के बीच आमने-सामने संपर्क स्थापित करके कुछ ऐसे रहस्यों का पता लगाने या उनकी जानकारी प्राप्त करना है जिनको उत्तरदाता के अतिरिक्त कोई नहीं जानता। इस प्रकार की जानकारी अन्य किसी प्रविधि के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। इस प्रकार की जानकारी प्रायः प्रत्यक्ष में प्रश्नोत्तर प्रणाली द्वारा की जाती है। उत्तरदाता से साक्षात्कारकर्ता सामने बैठकर प्रश्न पूछता है और साक्षात्कारकर्ता उत्तरदाता द्वारा किए गए कुछ उत्तरों को नोट कर लेता है तथा शेष जानकारी मौखिक रूप से ही कर ली जाती है। गुड एवं हैट के अनुसार, साक्षात्कार मौखिक रूप से सामाजिक अंतःक्रिया की एक प्रक्रिया है।”

प्रश्न 15.
औपचारिकता के आधार पर साक्षात्कार के प्रमुख प्रकार कौनसे हैं?
उत्तर
औपचारिकता के आधार पर साक्षात्कार के अग्रलिखित दो प्रमुख हैं

  1. औपचारिक साक्षात्कार-इस प्रकार के साक्षात्कार को नियंत्रित साक्षात्कार’ भी कहते हैं। इसमें अनुसंधानकर्ता साक्षात्कारदाता से पूर्वनिश्चित प्रश्नों को ही पूछ सकता है। इन प्रश्नों को पूछने में अनुसंधानकर्ता किसी प्रकार का संशोधन नहीं कर सकता और न ही इन प्रश्नों से हटकर दूसरे प्रश्न पूछ सकता है।
  2. अनौपचारिक साक्षात्कार-अनौपचारिक साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता पर किसी प्रकार के पूर्वनिर्मित प्रश्नों को पूछने पर कोई नियंत्रण नहीं होता और साक्षात्कारदाता भी प्रश्नों के उत्तर स्वतंत्र रूप से देता है। यह एक प्रकार से मुक्त वार्तालाप के रूप में होता है, जिसमें अनुसंधानकर्ता सूचनादाता से समस्या के विभिन्न पहलुओं पर सूचना प्राप्त करने का प्रयास करता है।

प्रश्न 16.
केंद्रीय साक्षात्कार किसे कहते हैं?
उत्तर
इस प्रकार का साक्षात्कार उत्तरदाता की उन परिस्थतियों के संबंध में किया जाता है, जिनमें उत्तरदाता पहले रहे चुका हो। इस प्रकार के साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता का ध्यान उसी परिस्थिति पर केंद्रित रहता है, जिसका पूर्वज्ञान साक्षात्कारदाता को है। साक्षात्कारकर्ता यह जानने का प्रयास करता है। कि अमुक परिस्थिति का उत्तरदाता पर क्या प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार के साक्षात्कार को केंद्रित साक्षात्कार इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें किसी घटना या इसके किसी विशेष अंग पर ही ध्यान । केद्रित करके प्रश्न पूछे जाते हैं। उदाहरणार्थ-एक साक्षात्कारदाता ने कोई फिल्म देखी है; तो साक्षात्कारकर्ता केंद्रित साक्षात्कार में यह जानने का प्रयास करता है कि साक्षात्कारदाता पर उस फिल्म का क्या प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार के साक्षात्कार में अनुसंधानकर्ता साक्षात्कारदाता को किसी प्रकार का कोई निर्देश नहीं देता,, वह निश्चित विषय या परिस्थति के अतिरिक्त अन्य किसी विषय या परिस्थिति पर केंद्रित नहीं रहता। इसके अतिरिक्त, इसमें साक्षात्कारकर्ता विषय का व्यक्तिगत रूप में गहन अध्ययन करता है। इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग रोबर्ट के० मर्टन ने रेडियो के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किया था। आज केंद्रित साक्षात्कार, जनसंचार, अनुसंधान में एक प्रमुख प्रविधि बन चुका है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अवलोकन की संकल्पना स्पष्ट कीजिए तथा इसके विभिन्न प्रकारों को संक्षेप में बताइए।
या
अवलोकन से आप क्या समझते हैं? अवलोकन के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख कीजिए।
या
“विज्ञान अवलोकन से आरंभ होता है और अपनी अंतिम वैधता के लिए इसे अवलोकन पर ही लौटना होता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर
वैज्ञानिक अध्ययन में तथ्यों के संकलन के लिए अपनाई जाने वाली विभिन्न पद्धतियों में अवलोकन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसे सामाजिक तथा प्राकृतिक दोनों प्रकार के विज्ञानों में समान रूप से अपनाया जाता है। इसीलिए यह एक सार्वभौम पद्धति मानी जाती है। वास्तव में, प्रत्येक विज्ञान को प्रारंभ अवलोकन द्वारा होता है तथा अंत में सत्यापन का परीक्षण भी अवलोकन द्वारा ही होता है। अवलोकन को एक प्राचीन तथा अति आधुनिक अनुसंधान पद्धति कंहा गया है। अवलोकन में अधिकांशतः ज्ञानेंद्रियों तथा मुख्य रूप से आँखों द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है। यह अत्यंत विश्वसनीय पद्धति मानी जाती है। इसीलिए इसका प्रयोग सर्वाधिक होता है।

अवलोकने का अर्थ एवं परिभाषाएँ

‘अवलोकन’ का शाब्दिक अर्थ ‘देखना’ है। इसे ‘निरीक्षण’ भी कहते हैं। ‘अवलोकन’, ‘निरीक्षण अथवा ‘प्रेक्षण’ को सभी प्रकार के विज्ञानों में महत्त्वपूर्ण स्थान है; क्योंकि हम सभी प्रकार की समस्याओं एवं घटनाओं को आँखों से देखकर पहचान सकते हैं। इस प्रकार अवलोकन किसी अध्ययन-वस्तु को निष्पक्ष भाव से देखने की वह प्रणाली है, जिसके द्वारा अनुसंधानकर्ता अध्ययन-वस्तु के संबंध में कुछ ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता है।
प्रमुख विद्वानों ने अवलोकन की परिभाषाएँ निम्न प्रकार दी हैं-

ऑक्सफोर्ड कंसाइज डिक्शनरी’ (Oxford Concise Dictionary) में अवलोकन को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है-“अवलोकन का अर्थ है घटनाओं को, जैसे कि वे प्रकृति में होती हैं, कार्य तथा कारण अथवा परस्पर संबंध की दृष्टि से यथातथ्य देखना और नोट करना।’

मोजर (Moser) के अनुसार-“अवलोकनको सुंदर ढंग से वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल की पद्धति कहा जा सकता है। ठोस अर्थों में अवलोकन में कानों तथा वाणी की अपेक्षा आँखों का प्रयोग होता है।”

यंग (Young) के अनुसार—अवलोकन आँखों के द्वारा किया गया विचारपूर्ण अध्ययन है, जिसका प्रयोग सामूहिक व्यवहार तथा जटिल सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ संपूर्णता का निर्माण करने वाली पृथक्-पृथक् इकाइयों का सूक्ष्म निरीक्षण करने की एक पद्धति के रूप में किया जा सकता है।”

अवलोकन की प्रमुख विशेषताएँ

अवलोकन की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. मानव-इंद्रियों, विशेष रूप से आँखों का प्रयोग–अवलोकन में मानव इंद्रियों का; विशेष रूप से आँखों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसे ‘आँखों द्वारा देखने की एक कला’ कहा गया है, जिससे अध्ययन-वस्तु से सम्बन्धित प्राथमिक सामग्री का संचय किया जाता है। मोजर ने ठीक ही कहा है कि “ठोस अर्थ में अवलोकन में कानों और वाणी की अपेक्षा आँखों का अधिक प्रयोग होता है।”
  2. मूलभूत वैज्ञानिक पद्धति–अवलोकन को एक मूलभूत वैज्ञानिक पद्धति माना गया है; क्योंकि – यह प्रत्येक विषय (चाहे वह प्राकृतिक विज्ञान है अथवा सामाजिक विज्ञान) में सामान्य रूप से प्रयोग की जाती है। इस प्रविधि के द्वारा विश्वसनीय सूचनाएँ एकत्रित की जा सकती हैं।
  3. अध्ययन-वस्तु का प्रत्यक्ष निरीक्षण–अवलोकन एक वैज्ञानिक पद्धति है, जिसमें अध्ययन-वस्तु का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया जा सकता है। यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें अनुसंधानकर्ता अपनी सभी इंद्रियों का प्रयोग करके अध्ययन-वस्तु से संबंधित तथ्यों की प्रत्यक्ष रूप से खोज करता है।
  4. उद्देश्यपूर्ण अध्ययन–अवलोकन पद्धति इसलिए भी वैज्ञानिक मानी जाती है क्योंकि यह उद्देश्यपूर्ण अध्ययनों में सहायक है। इसके द्वारा अनुसंधानकर्ता अपनी सभी इंद्रियों का प्रयोग केवल उन्हीं घटनाओं के अवलोकन के लिए करता है, जो अध्ययन की समस्या के अनुकूल हैं।
  5.  गहन अध्ययन–अवलोकन केवल उद्देश्यपूर्ण अध्ययन करने में ही सहायक नहीं है, अपितु गहन अध्ययन करने में भी सहायक है। यह सामाजिक मानवशास्त्र तथा मानवशास्त्र जैसे विषयों में एकमात्र ऐसी प्रविधि है, जो विश्वसनीय सूचनाओं को गहन रूप से संकलित करने में सहायक है। समाजशास्त्र में भी इसका प्रयोग एक पूर्ण अथवा पूरक प्रविधि के रूप में बढ़ता जा रहा है।
  6. कार्य-कारण संबंधों की व्याख्या-अवलोकन द्वारा विभिन्न घटनाओं में पाए जाने वाले कार्य-कारण संबंधों की व्याख्या की जा सकती है। प्राकृतिक विज्ञानों में यह कार्य-कारण संबंधों की व्याख्या करने की एकमात्र पद्धति है। समाजशास्त्र में भी इसका प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
  7. विश्वसनीयता–अवलोकन द्वारा एकत्रित सूचनाएँ अधिक विश्वसनीय होती हैं। इसमें क्योंकि अनुसंधानकर्ता स्वयं देखकर अध्ययन करता है, इसलिए वस्तुनिष्ठ एवं विश्वसनीय सूचनाएँ ही संकलित होती हैं। इसमें किसी घटना एवं समस्या का अध्ययन उसी रूप में किया जाता है, जिस रूप में वह विद्यमान होती है।
  8. सामूहिक व्यवहार का अध्ययन–अवलोकन सामूहिक व्यवहार का अध्ययन करने में भी सहायक है। क्योंकि इसमें अवलोकनकर्ता सरलता से अवलोकित समूह के सदस्यों से घुल-मिल जाता है, इसलिए वह बिना अपना उद्देश्य बताए समूह के सदस्यों के सामूहिक व्यवहार का अध्ययन कर सकता है।

अवलोकन के प्रमुख प्रकार

सामाजिक अनुसंधान में अवलोकन का प्रयोग विविध रूपों में किया जाता है। प्रमुख रूप से अवलोकन को निम्नलिखित प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

1. अनियंत्रित अथवा साधारण अवलोकन-जब अनुसंधानकर्ता किन्हीं प्राकृतिक अवस्थाओं का अध्ययन करने हेतु कुछ क्रियाओं का निरीक्षण करता है तो वह अपने निरीक्षण कार्य में पूर्ण स्वतंत होता है। उसके इस कार्य में किसी बाह्य शक्ति या आंतरिक भावना का कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता। इस प्रकार की स्वतंत्र निरीक्षण विधि में अनुंसधानकर्ता का आंतरिक या बाह्य किसी भी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं होता, इसलिए इस अवलोकन को समाजशास्त्रियों ने अनियंत्रित अवलोकन की संज्ञा दी है। इस प्रकार के अवलोकन से अनुसंधानकर्ता अध्ययन-वस्तु से संबंधित संपूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेता है। इसलिए गुड एवं हैट (Goode and Hatt) का कहना है, “व्यक्तियों के पास सामाजिक संबंधों के बारे में जो कुछ भी ज्ञान है,वह अनियंत्रित निरीक्षण के द्वारा ही प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार पी०वी० यंग (PV. Young) ने लिखा है, “अनियंत्रित अवलोकनों में जीवन की वास्तविक दशाओं की सावधानीपूर्वक परीक्षा की जाती है तथा अवलोकित घटना की यथार्थता की जाँच करने अथवा यथार्थता के परीक्षण-हेतु यंत्रों के प्रयोग करने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाता।” इस प्रकार, अनियंत्रित अवलोकन में घटना का वास्तविक रूप में अध्ययन किया जाता है तथा उस घटना पर अथवा अवलोकतनकर्ता पर किसी प्रकार का नियंत्रण रखने का प्रयास नहीं किया जाता। अनियंत्रित अवलोकन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

  • सहभागी अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता उस समूह में जाकर बस जाती है जिसका वह अध्ययन करता है। अनुसंधानकर्ता समूह की सभी क्रियाओं में सक्रिय भाग लेता है और अपने आपको समूह के सदस्य के रूप में स्वीकार होने योग्य बना देता है। इस प्रकार सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह के लोगों से घुल-मिलकर समूह की गतिविधियों व समस्या का अध्ययन करता है। किन्तु इस संबंध में अनुसंधानकर्ता को काफी सतर्क रहना पड़ता है ताकि किसी भी स्तर पर समूह के सदस्यों को उस पर किसी प्रकार की शंका न होने पाए, अन्यथा समूह के सदस्यों के व्यवहार में औपचारिकता एवं कृत्रिमता आ जाएगी और अनुसंधानकर्ता अपने उदृदेश्य की पूर्ति करने में असफल रहेगा।
  • असहभागी अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह का सदस्य नहीं बनता और न वह उस समूह की क्रियाओं में कोई भाग ही लेता है। वह दूर से ही समूह की क्रियाओं का अध्ययन करता है और साथ-ही-साथ समूह के सदस्यों को अपना परिचय देकर यह भी बतला देता है कि उसका उद्देश्य समूह की क्रियाओं का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष भाव से अध्ययन करना है। इस प्रकार असहभागी अवलोकन, सहभागी अवलोकन का विपरीत रूप है।
  • अर्द्ध-सहभागी अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समुदाय के कुछ कार्यों में भाग लेकर और कुछ कार्यों में वह भाग न लेकर समूह का तटस्थ रूप से अध्ययन करता है। इस प्रकार कुछ सीमा तक अनुसंधानकर्ता सहभागी अवलोकन द्वारा समुदाय का अध्ययन करता है। यह सहभागी तथा असहभागी अवलोकन दोनों का मिश्रित रूप है तथा वास्तव में अधिक, उपयोगी है।

2. नियंत्रित अथवा व्यवस्थित अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता पर अनेक नियंत्रण लगे रहते हैं। यह नियंत्रण अनेक प्रविधियों के रूप में लगा होता है। दूसरे शब्दों में, नियंत्रित अवलोकन के अंतर्गत अनुसंधानकर्ता को अवलोकन कार्यों में अनेक सीमाओं का ध्यान रखना पड़ता है। ये सीमाएँ सामाजिक घटनाओं के लिए और साथ-ही-साथ अनुसंधानकर्ता के लिए लगाई जाती हैं। क्योंकि सामाजिक घटनाओं में घटना पर नियंत्रण रखना कठिन है, इसलिए अधिकांशतया अनुसंधानकर्ता को स्वयं पर ही नियंत्रण रखना पड़ता है। अनुसंधानकर्ता को अवलोकन करने की योजनाओं को बनाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त अपनी डायरी में अवलोकित तथ्यों को लिखना पड़ता है या उन्हें टेपरिकॉर्डर द्वारा रिकॉर्ड करना पड़ता। है। इस प्रकार नियंत्रित अवलोकन में अवलोकनकर्ता को निश्चित सिद्धांतों की सीमाओं में रहकर ही अवलोकन का कार्य करना पड़ता है।

3. सामूहिक अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में एक ही समस्या का अवलोकन कई अनुसंधानकर्ता एक साथ सामूहिक रूप से करते हैं। ये अनुसंधानकर्ता सामाजिक घटना के विभिन्न पक्षों के विशेषज्ञ होते हैं। अवलोकन करने के उपरांत ये सब अनुसंधानकर्ता विचार-विमर्श करके समस्या से संबंधित उपकल्पना निर्माण करते हैं। इस प्रकार के अवलोकन | में व्यक्तिगत पक्षपात होने तथा किसी पक्ष के छूट जाने की संभावना पूर्णतया समाप्त हो जाती है।

निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि अवलोकन एक ऐसी प्रविधि है,जिसमें अनुसंधानकर्ता अपनी आँखों से देखकर किसी समस्या का विचारपूर्वक अध्ययन करता है। इस प्रकार का अवलोकन अनियंत्रित, नियंत्रित तथा सामूहिक हो सकता है। जब अनुसंधानकर्ता समस्या से संबंधित समुदाय का सदस्य बनकर समुदाय के कार्य में सक्रिय भाग लेता है तो वह सहभागी अवलोकन कहलाता है और जब वह समुदाय के कार्य में भाग न लेकर दूर से ही समुदाय को अध्ययन करता है तो वह असहभागी अवलोकन कहलाता है। कभी-कभी अनुसंधानकर्ता कुछ कार्यों में भाग लेकर और कुछ दूर से ही देखकर समस्या का अध्ययन करता है। ऐसी स्थिति को समाजशास्त्रियों ने अर्द्ध-सहभागी अवलोकन कहा है। सभी प्रकार के अवलोकन समुदाय और उसकी समस्याओं का पूर्ण ज्ञान प्रदान करने में सहायक होते हैं, इसलिए कहा गया है, जो कुछ भी किसी समस्या का हमें ज्ञान है, वह अवलोकन का ही प्रतिफल है।”

प्रश्न 2.
पद्धति एवं यंत्र (तकनीक) से आप क्या समझते हैं? पद्धति एवं यंत्र में अंतर स्पष्ट कीजिए। “अंतिम ध्येय तक का संपूर्ण मार्ग पद्धति है, जबकि उस संपूर्ण मार्ग को पूरा करने में प्रयुक्त उपकरण यंत्र है।” इस कथन की पुष्टि करते हुए ‘पद्धति’ तथा ‘यंत्र में सोदाहरण अंतर स्पष्ट कीजिए।
या
‘पद्धति’ तथा ‘यंत्र का अर्थ बताते हुए दोनों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
समाजशास्त्र तथा अन्य सभी सामाजिक विज्ञानों में कुछ पद्धतियों (Method) एवं यंत्रों (Tool or Technique) का प्रयोग किया जाता है। पद्धति हमारे अनुसंधान को दृष्टिकोण प्रदान करती है तथा अनुसंधान के सभी चरणों में सहायता प्रदान करती है। यह अनुसंधान करने वाले का मार्गदर्शन करती है। तथा उसे वास्तविकता को देखने तक एक विशिष्ट नजरिया प्रदान करती है। इसके विपरीत, यंत्र अथवा तकनीक केवल आँकड़ों के संकलन का एक माध्यम मात्र है। यह केवल अनुसंधान के एक चरण अर्थात् तथ्यों या आँकड़ों के संकलन से संबंधित है।

पद्धति का अर्थ एवं परिभाषाएँ

पद्धति वह तरीका है, जिसको अपनाकर एक अनुसंधानकर्ता अपना अध्ययन करता है। विभिन्न विद्वानों ने पद्धति को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है–

वुल्फ (Wolfe) के मतानुसार-“विस्तृत अर्थ में कोई भी अनुसंधान पद्धति, जिसके द्वारा विज्ञान का निर्माण हुआ हो अथवा उसका विस्तार किया जा रहा हो, वैज्ञानिक पद्धति कहलाती है।”

लुडबर्ग (Lundberg) के विचारानुसार-“वैज्ञानिक पद्धति में समंकों का क्रमबद्ध अवलोकन, वर्गीकरण तथा निर्वाचन सम्मिलित है। हमारे प्रतिदिन के निष्कर्षों तथा वैज्ञानिक पद्धति में अंतर; उसके स्वरूप, दृढ़ता, सत्यापन किए जाने की शक्ति, योग्यता तथा विश्वसनीयता के आधार हैं।”

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका’ (Encyclopaedia Britanica) के अनुसार-“वैज्ञानिक पद्धति एवं विभिन्न प्रक्रियाओं का संकेत करने वाला एक समूहवाचक पद है, जिसकी सहायता से विज्ञान बनाए गए हैं। विस्तृत अर्थों में खोज की कोई भी विधि वैज्ञानिक पद्धति कहला सकती है, जिसके द्वारा वैज्ञानिक तटस्थ और व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त कर सकता है।”

बर्टेड (Bertrand) के अनुसार-“प्रकृति में नियमितता के निर्धारण और वर्गीकरण में प्रयुक्त प्रणाली को वैज्ञानिक पद्धति कहा जाता है।”

गुड एवं हैट (Goode and Hatt) के अनुसार–“जब विज्ञान की आधारभूत बातों को समाजशास्त्र के क्षेत्र में लागू किया जाता है तो उसे समाजशास्त्र की अध्ययन पद्धति कहते हैं।’

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि पद्धति एक ऐसा उपकरण या माध्यम है, जिसके द्वारा वैज्ञानिक अपना अध्ययन करता है। यह संपूर्ण अध्ययन को दृष्टिकोण प्रदान करती है।

पद्धति की प्रमुख विशेषताएँ

पद्धति में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं-

  1. सत्यापन तथा उसकी परीक्षा-वैज्ञानिक पद्धति द्वारा जो भी निष्कर्ष निकाले जाते हैं, वे सत्य होते हैं। किसी भी प्रकार का संदेह होने पर भविष्य में भी उनकी सत्यता की परीक्षा की जाती है।
  2. सुनिश्चितता–वैज्ञानिक पद्धति पूर्णत: सुनिश्चित होती है और उसका प्रयोग कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इसके सुस्पष्ट चरण हैं, जिनके बारे में किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं पाया जाता है।
  3. निष्पक्षता–वैज्ञानिक पद्धति में अध्ययनकर्ता अपने स्वयं के विचारों से प्रभावित नहीं होता वरन् वह निष्पक्ष भाव से अपने अवलोकन के आधार पर ही निष्कर्षों का निर्माण करता है।
  4. सार्वभौमिकता-वैज्ञानिक पद्धति तथ्य विशेष पर लागू नहीं होती बल्कि वह वर्ग विशेष परे लागू होती है, इसलिए वह सार्वभौमिक होती है। दूसरे शब्दों में, वैज्ञानिक पद्धति का रूप सभी विषयों में एक समान होता है।
  5. निष्कर्षों का पूर्वानुमान-वैज्ञानिक पद्धति में जिन निष्कर्षों को प्राप्त किया जाता है उनके संबंध में पूर्व अनुमान लगा लिया जाता है। उपकल्पना का निर्माण एक प्रकार से पूर्वानुमान ही है। यदि यह (पूर्वानुमान) प्रमाणित हो जाता है तो निष्कर्ष बन जाता है।
  6. भविष्यवाणी–वैज्ञानिक पद्धति के अंतर्गत किसी तथ्य के संबंध में भविष्यवाणी की जा सकती है। क्योंकि इसमें कार्य-कारण संबंधों का पता चल जाता है इसलिए आने वाले समय में अनुमान भी लगाया जा सकता है।

समाजशास्त्र में प्रयुक्त प्रमुख पद्धतियाँ

आज समाशास्त्र में निम्नलिखित पद्धतियों का मुख्यत: प्रयोग किया जाता ह-

  1. ऐतिहासिक पद्धति-इस पद्धति के द्वारा अध्ययन की विषय-वस्तु के इतिहास तथा उसके विकास का पूर्ण अध्ययन किया जाता है और उस अध्ययन के आधार पर ही विषय-वस्तु के संबंध में अनेक नवीन खोजें की जाती हैं। यह विधि अतीत का अध्ययन करने की सर्वोत्तम पद्धति है।
  2. तुलनात्मक पद्धति–इस पद्धति के द्वारा विभिन्न विषयों पर परस्पर तुलना की जाती है। इस तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर विषयों से संबंधित अनेक नवीन तथ्यों की खोज की जाती है।
  3. आगमन तथा निगमन पद्धति-आगमन पद्धति में विशिष्ट इकाइयों का अध्ययन करके सामान्य सिद्धांतों का निर्माण किया जाता है और निगमन पद्धति में सामान्य सिद्धांतों को विशिष्ट इकाइयों पर लागू किया जाता है।
  4. संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक पद्धति–संरचनात्मक पद्धति में किसी विषय की संरचना का विश्लेषण करके उन तत्त्वों की खोज की जाती है, जो विषय की संरचना में मुख्य रूप से योगदान देते हैं। प्रकार्यात्मक पद्धति में किसी समग्र के किसी एक विशेष अंग या भाग का अध्ययन किया जाता है। वह अंग उस समग्र को बनाए रखने में जो योगदान देता है,उसे ही उसका प्रकार्य कहते हैं।

इन पद्धतियों के अतिरिक्त, समाजशास्त्र में संघर्ष पद्धति, व्यवस्थात्मक पद्धति, व्यवहारात्मक पद्धति, अंत-क्रियात्मक पद्धति इत्यादि का भी प्रयोग किया जाता है।

यंत्र या तकनीक का अर्थ एवं परिभाषा

यंत्र एक प्रकार से एक ऐसी युक्ति है, जिसका सहारा लेकर एक वैज्ञानिक अथवा समाजशास्त्री अपनी अध्ययन-वस्तु के संबंध में अनेक तंथ्यों का संकलन करता है। इसलिए गुड तथा हैट ने कहा है कि यंत्रों में वे विशिष्ट प्रणालियाँ सम्मिलित हैं जिनके द्वारा समाजशास्त्री अपने समंकों को एकत्रित और व्यवस्थित करता है। इस प्रकार यंत्र शोध कार्य में सहायता देने वाले तथ्यों को संकलन करने की एक प्रणाली का नाम है।

यंत्र यो तकनीक की प्रमुख विशेषताएँ

यंत्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1.  विषय-सामग्री के संकलन में सहायता-यंत्र एक उपकरण का नाम है, जिसके द्वारा एक समाजशास्त्री अपने क्षेत्र की विषय-सामग्री को संकलित एवं व्यवस्थित करता है। प्रश्नावली, अनुसूची, अवलोकन, साक्षात्कार, वैयक्तिक अध्ययन, समाजमिति इत्यादि ऐसे ही कुछ उपकरण हैं।
  2. अध्ययन की विषय-वस्तु के अनुसार भिन्नता–यंत्र भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न प्रकार का भी हो सकता है। सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर यह निर्णय लेना पड़ता है कि कौन-से यंत्र द्वारा तथ्यों का संकलन किया जाए। उदाहरणार्थ-जनजातियों के अध्ययन में सहभागी अवलोकन यंत्र उपयुक्त माना गया है, जबकि शिक्षित लोगों के अध्ययन में प्रश्नावली सर्वाधिक उपयुक्त यंत्र है।
  3. सामाजिक विज्ञानों से भिन्नता–भौतिक विज्ञानों की पद्धतियों और सामाजिक विज्ञानों के यंत्रों में अंतर पाया जाता है। क्योंकि सामाजिक-सांस्कृतिक तथा भौतिक घटनाओं की प्रकृति में अंतर है अतः दोनों की अध्ययन पद्धतियाँ भी भिन्न हैं।
  4. अंतर की कम संभावना-सामाजिक विज्ञानों में प्रयोग किए जाने वाले यंत्रों में बहुत कम अंतर देखने को मिलता है। परस्पर संबंधित विषय होने के कारण इनमें प्रयुक्त यंत्रों में समानता होना स्वाभाविक ही है।
  5. अनिश्चित प्रकृति-यंत्र अनिश्चित होते हैं। नई-नई समस्याओं का अध्ययन करने के लिए नए-नए यंत्रों का विकास होता है।
  6. असार्वभौमिकता-यंत्रों का प्रयोग सभी विज्ञानों में नहीं किया जाता और यंत्रों के स्वरूपों में अंतर पाया जाता है।
  7.  सामग्री का संकलन-यंत्र का उद्देश्य केवल सामग्री को एकत्रित करना ही नहीं है अपितु उसको व्यवस्थित करना भी है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि यंत्र एक ऐसा उपकरण है जो अनुसंधान में आँकड़े एकत्रित करने में सहायता प्रदान करता है।

पद्धति और यंत्र में अंतर

कुछ लोग पद्धति तथा यंत्र को एक ही समझ लेते हैं जोकि उचित नहीं है। दोनों में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं-

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology Research Methods 1
UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology Research Methods 2

निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि पद्धति तथा यंत्र दो भिन्नं संकल्पनाएँ हैं। पद्धति अनुसंधान को दृष्टिकोण प्रदान करती है तथा अनुसंधान के सभी चरणों में सहायक होती है। यंत्र का संबंध केवल आँकड़ों के संकलन के उपकरण से है।

प्रश्न 3.
अवलोकन कार्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं का उल्लेख कीजिए और उनको दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
या
अवलोकन को वैज्ञानिक बनाने हेतु सुझाव दीजिए।
उत्तर
अवलोकन प्रविधि सामाजिक अनुसंधान में प्रयोग की जाने वाली सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि है, परंतु यह जितनी सरल लगती है, वास्तव में इसके द्वारा ऑकड़े एकत्रित करना उतना ही कठिन कार्य है। अवलोकन अनेक रूपों में प्रभावित होता है, जिन्हें हम इसके मार्ग में आने वाली बाधाएँ कह सकते हैं।
अवलोकन के मार्ग की प्रमुख बाधाएँ अवलोकन के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाएँ इस प्रकार हैं-

1. नेत्रों के कार्य में पक्षपात–अवलोकन का कार्य करने में हमारी ज्ञानेंद्रियाँ महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं। इन ज्ञानेंद्रियों में सर्वप्रथम स्थान नेत्रों का है। नेत्रों के द्वारा ही हम अपना निरीक्षण कार्य करते हैं, किंतु कई परीक्षणों से यह सिद्ध हो चुका है कि नेत्रों द्वारा देखा गया दृश्य भी कभी-कभी विश्वसनीय नहीं होता है। दूसरे शब्दों में, हमारे नेत्रों की अवलोकन शक्ति भी अचूक नहीं होती है। हम कभी-कभी अत्यंत पक्षपातपूर्ण ढंग से या अपने मूल्यों वे शंकाओं के अनुरूप किसी वस्तु का निरीक्षण करते हैं; अतः हम अपने अवलोकन के कार्य में सफल नहीं होते। इसीलिए कहा गया है कि हम अपनी ज्ञानेंद्रियों के पक्षपातपूर्ण कार्यों के कारण भी अवलोकन को विश्वसनीय नहीं कह सकते।

2. व्यवहार की अनिश्चितता–अवलोकन के कार्य में एक मुख्य बाधा अवलोकन किए जाने वाले समूह के व्यक्तियों के व्यवहार की अनिश्चितता भी है। व्यक्ति अपने व्यवहार में वास्तविक नहीं होते। जब किसी समूह के व्यक्तियों को यह पता चलता है कि उनके व्यवहार का अवलोकन किया रहा है तो उनके व्यवहार में कृत्रिमता आ जाती है और इस व्यवहार की कृत्रिमता के कारण उनके द्वारा किए गए क्रिया-कलापों का अवलोकन विश्वसनीय नहीं होता। ऐसी दशा में सदस्यों के व्यवहार की कृत्रिमता अवलोकन के कार्य में बाधा पहुँचाती है।

3. पूर्वज्ञान का महत्त्व–अनुसंधानकर्ता पूर्वज्ञान के आधार पर भी बहुत-सी वस्तुओं के संबंध में अनुमान कर लेता है। इसलिए वह केवल अवलोकन पर ही आश्रित नहीं रहता। उसका पूर्वज्ञान कभी-कभी अध्ययन-वस्तु के संबंध में उसे धोखा भी दे सकता है या अपने पूर्वज्ञान के आधार पर वह वस्तु के संबंध में अपनी कल्पनाएँ बना लेता है और अवलोकन की उपेक्षा करके वस्तु के संबंध में कल्पनाओं के आधार पर प्राप्त ज्ञान को ही सत्य मान लेता है। इस प्रकार पूर्वज्ञान भी अवलोकन के मार्ग में बाधा उपस्थित करता है।

4. अनुसंधानकर्ता का स्वार्थ-अवलोकन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अनुसंधानकर्ता का व्यक्तिगत पक्षपात है। अनुसंधानकर्ता अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण से किसी विषय-वस्तु का अध्ययन करता है। सभी समस्याओं का अध्ययन अनुसंधानकर्ता अपने-अपने दृष्टिकोण से भिन्न-भिन्न रूप में करते हैं। इसके अतिरिक्त अनुसंधानकर्ता जिन समस्याओं का अध्ययन करना चाहता है, वह स्वयं भी उन्हीं घटनाओं से अथवा व्यक्तिगत पक्षपात से प्रभावित रहता है। अनुसंधानकर्ता का व्यक्तिगत पक्षपात भी अवलोकन के मार्ग में बाधक है।

5. घटनाओं के पूर्ण ज्ञान में कमी-अवलोकन के कार्य में सबसे बड़ी बाधा यह भी है कि अवलोकन के द्वारा घटनाओं का पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। जिन घटनाओं का हम अध्ययन कर रहे हैं, यह सम्भव है कि वे घटनाएँ किन्हीं विशेष परिस्थितियों में घटित हों। इन विशेष परिस्थितियों में घटित होने के कारण उनमें अनेक बाधाएँ उपस्थित होती हैं।

अवलोकन को वैज्ञानिक बनाने के लिए सुझाव

अवलोकन की सीमाओं को यदि सामने रखा जाए तो इसको वैज्ञानिक बनाने के मार्ग में पक्षपात, व्यवहार में कृत्रिमता तथा अवलोकनकर्ता के स्वार्थ आदि प्रमुख समस्याएँ आती हैं, लेकिन इन्हें थोड़ी सावधानी बरतकर दूर किया जा सकता है। अवलोकन को निम्नलिखित उपायों द्वारा अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकता है-

  1. अवलोकन योजना–अवलोकन करने से पहले अनुसंधानकर्ता को चाहिए कि वह किसी कार्य का अवलोकन करने से पूर्व अपनी अध्ययन-वस्तु के संबंध में पूर्ण योजना बना ले, जिससे अवलोकन को कार्य सरल हो जाता है तथा अवलोकनकर्ता निर्धारित योजना के अनुसार केवल संबंधित तथ्यों का ही अवलोकन करता है।
  2. निष्पक्षता–अवलोकनकर्ता को चाहिए कि वह उन तथ्यों को निष्पक्ष एवं भाव से चयन करे, जिनका उसे अध्ययन करना है। इस अध्ययन में उसके विचार पक्षपात का स्रोत हो सकते हैं। इसलिए अपने विचारों से प्रभावित हुए बिना उसे निष्पक्ष रूप से अपना अध्ययन करना चाहिए।
  3. अवलोकन पथप्रदर्शिका तथा अनुसूची का प्रयोग–अवलोकन में यदि अवलोकन पथप्रदर्शिका तथा अनुसूची का प्रयोग किया जाए तो वह अधिक सूक्ष्म तथा अर्थपूर्ण हो सकती है। अनुसूची इस प्रकार तैयार की जानी चाहिए कि उसके आधार पर अध्यय-वस्तु के संबंध में पूर्ण ज्ञान हो सके।
  4. उपकल्पना का निर्माण–अवलोकन कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए सुनिश्चित उपकल्पना का निर्माण करना अत्यन्त आवश्यक है; क्योंकि ऐसा करने से अनुसंधान कार्य केंद्रित हो जाता है।
  5. निश्चित समस्या का निर्माण–अवलोकन की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि अध्ययन के लिए किसी निश्चित समस्या का निर्माण किया जाए और साथ-ही-साथ समस्या के अध्ययन का क्षेत्र भी निश्चित किया जाए। सामान्य समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन एक कठिन कार्य है।
  6. यांत्रिक साधनों का प्रयोग–अवलोकन को फोटो-फिल्म (कैमरा) तथा टेप-रिकॉर्डर इत्यादि का प्रयोग करके अधिक सूक्ष्म और विश्वसनीय बनाया जा सकता है। यांत्रिक साधन मानवीय इंद्रियों के प्रयोग की कमी को दूर करने में सहायता प्रदान करते हैं।
  7. समाजमिति पैमानों का प्रयोग-समाजमिति पैमानों का प्रयोग करके गुणात्मक सामाजिक तथ्यों को ठीक प्रकार से मापा जा सकता है तथा अवलोकित सूचना की प्रामाणिकता की जाँच की जा सकती है। समाजमिति लघु समूहों में अवलोकन को अधिक विश्वसनीय एवं वैज्ञानिक बनाने में सहायक है।
  8. निष्पक्ष व्यवहार—अवलोकनकर्ता के कार्य में पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहिए। यदि वह निष्पक्ष रूप से व्यवहार का अवलोकन करेगा तो उसके निष्कर्ष अधिक प्रामाणिक, विश्वसनीय एवं वैज्ञानिक होंगे। यद्यपि यह एक कठिन कार्य है, तथापि अवलोकन-योजना बनाकर निष्पक्षता बनाए रखी जा सकती है।
  9. अवलोकन का सामूहिक रूप-अवलोकन को अधिक सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि अवलोकन का कार्य सामूहिक रूप से किया जाए, क्योंकि अनेक क्षेत्रों के विशेषज्ञों के द्वारा अवलोकन निष्पक्ष तथा त्रुटिहीन होता है। इसके लिए अनुसंधानकर्ताओं को एक दल सामूहिक रूप से घटनाओं को अवलोकन करता है। किसी एक अनुसंधानकर्ता की कमी अन्य अनुसंधानकर्ताओं के अवलोकन द्वारा दूर हो जाती है। इसलिए आजकल अवलोकन में सामूहिक दलों का महत्त्व निरंतर बढ़ता जा रहा है।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचने से यह स्पष्ट हो जाता है कि अवलोकन के मर्ग में आने वाली प्रमुख धाएँ वास्तव में अवलोकन पद्धति की कमियाँ नहीं हैं, अपितु अनुसंधानकर्ता द्वारा इस पद्धति का दोषपूर्ण रूप से प्रयोग करना है। इसलिए इसे वैज्ञानिक बनाने में अवलोकनकर्ता को ही अपने पर नियंत्रण रखना पड़ता है तथा उन सभी स्रोतों के प्रति सावधान रहना पड़ता है, जो अध्ययन को प्रभावित करके इसे अवैज्ञानिक बना देते हैं। सामूहिक दलों द्वारा अवलोकने का निरंतर बढ़ता हुआ उपयोग इस बात को प्रमाणित करता है कि यदि व्यक्तिगत पक्षपात पर नियंत्रण कर लिया जाए तो अवलोकन को काफी सीमा तक वैज्ञानिक बनाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
सहभागी अवलोकन की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
या
सहभागी तथा असहभागी अवलोकन में अन्तर बताइए।
उत्तर
सामाजिक अनुसंधान में जिन पद्धतियों द्वारा आँकड़ों को संकलन किया जाता है, उनमें अवलोकन का प्रमुख स्थान है। यह सर्वाधिक प्रचलित पद्धति है, जिसमें आँखों का अधिकतर प्रयोग किया जाता है। सहभागी तथा असहभागी अवलोकन इसके प्रमुख प्रकार हैं।

सहभागी अवलोकन का अर्थ एवं परिभाषाएँ

सहभागी अवलोकन में अवलोकनकर्ता अध्ययन की जाने वाली परिस्थितियों में स्वयं भाग लेता है और इस समूह का औपचारिक सदस्य बन जाता है। समूह में पूर्ण रूप से घुल-मिलकर तथा सभी क्रिया-कलापों में भाग लेकर अपना उद्देश्य प्रकट किए बिना वह समूह के सदस्यों का अवलोकन करता है। सहभागी अवलोकन का प्रयोग तब किया जाता है जबकि अनुसंधानकर्ता उस समूह में स्वयं घुल-मिल जाता है जिसका कि वह अध्ययन करना चाहता है। प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्न प्रकार परिभाषित किया है–

सोजर एवं कैल्टन (Moser and Kalton) के अनुसार—“इस विधि द्वारा अवलोकनकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह अथवा संगठन के दैनिक जीवन में प्रवेश करता है।”

यंग (Young) के अनुसार–‘सहभागी अवलोकन में अवलोकनकर्ता किसी समूह की अस्थायी सदस्यता ग्रहण कर लेता है और समूह के सदस्यों के साथ मिलकर समूह के कार्यों में भाग लेता है, किंतु वह समूह के किसी भी सदस्य को यह आभास नहीं होने देता कि वह समूह का अध्ययन करने के उद्देश्य से समूह के कार्यों में समूह के सदस्य के साथ घुल-मिलकर भाग ले रहा है।”

गुड एवं हैट (Goode and Hatt) के अनुसार-“इस प्रविधि का प्रयोग तभी किया जा सकता है। जबकि अवलोकनकर्ता अपने उद्देश्य को प्रकट किए बिना उसी समूह का सदस्य मान लिया जाता है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सहभागी अवलोकन में अवलोकनकर्ता उसी समूह का एक सदस्य बन जाता है जिसका कि उसे अवलोकन करना है। समूह में पूर्ण रूप से घुल-मिलकर तथा सभी क्रियाकलापों में भाग लेकर अपना उद्देश्य प्रकट किए बिना वह समूह के सदस्यों का अवलोकन करता है।

असहभागी अवलोकन का अर्थ एवं परिभाषाएँ

असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समस्या से संबंधित समूह का न हो अस्थायी सदस्य बनता है। और न समूह के कार्यों में सक्रिय भाग लेता है, बल्कि वह दूर से ही एक तटस्थ निरीक्षणकर्ता के रूप में समस्याओं का अध्ययन करता है। इस अवलोकन में अवलोकनकर्ता अधिक गहराई तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं करता। प्रमुख विद्वानों ने इसे इस प्रकारे परिभाषित किया

हैपी०एच० मन (PH, Mann) के अनुसार–‘असहभागी अवलोकन एक ऐसी विधि है जिसमें अवलोकन करने वाला अवलोकित से छिपा रहती है।” इस प्रकार असहभागी अवलोकन समूह के सदस्यों में सहभागिता किए बिना किया जाने वाला अवलोकन है। यह अवलोकन ही अधिकांश अध्ययनों में प्रयोग किया जाता है।

सहभागी तथा असहभागी अवलोकन में अंतर

सहभागी तथा असहभागी अवलोकन दो विपरीत प्रकार के अवलोकन हैं, जिनकी अपनी-अपनी उपयोगिताएँ तथा सीमाएँ हैं। दोनों में प्रमुख अंतर इस प्रकार से किया जा सकता है-

  1. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह का अस्थायी सदस्य होता है, किन्तु असहभागी अवलोकन मे अनुसंधानकर्ता समूह का सदस्य नहीं होता।
  2. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता तटस्थ निरीक्षक के रूप में कार्य नहीं करता, परंतु असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता तटस्थ दर्शक के रूप में समस्या का अध्ययन करता है।
  3. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता एक प्रकार से परिचित व्यक्ति होता है, जबकि असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता एक अपरिचित व्यक्ति होता है।
  4. सहभागी अवलोकन के अंतर्गत अनुसंधानकर्ता स्वयं समूह का सदस्य रहता है, अतएव उसको अधिक समय तथा अधिक धन व्यय करना पड़ता है, जबकि असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह की अस्थायी सदस्यता ग्रहण नहीं करता, अतएव उसके अनुसंधान कार्य करने में समय तथा धन कम लगता है।
  5. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता प्राप्त सूचनाओं की सत्यता की जाँच कर सकता है, परंतु असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता प्राप्त सूचनाओं की सत्यता की जाँच नहीं कर सकता।
  6. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह का अस्थायी सदस्य होता है, जबकि असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह का. सदस्य न होने के कारण एक अपरिचित तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति होता है।

निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सहभागी एवं असहभागी अनुसंधान में प्रयोग किए जाने वाले दो भिन्न प्रकार के अवलोकन हैं। प्रथम में अनुसंधानकर्ता को अवलोकित समूह का अस्थायी सदस्य बनना पड़ता है। असहभागी अवलोकन में वह समूह में जाकर तटस्थ दर्शक के रूप में अवलोकन करता है।

प्रश्न 5.
एक अच्छे अवलोकनकर्ता के मुख्य गुणों का विवेचन कीजिए।
या
“अवलोकन की सफलता एक अच्छे अवलोकनकर्ता पर निर्भर करती है।” इस कथन के संदर्भ में एक अच्छे अवलोकनकर्ता के मुख्य गुणों की विवचेना कीजिए।
उत्तर
एक अच्छे अवलोकनकर्ता के गुण अवलोकन इतना सरल कार्य नहीं है जितना कि यह ऊपर से देखने में लगता है; अत: इसे ठीक प्रकार से करने के लिए तथा सही व वस्तुनिष्ठ सूचनाएँ एकत्रित करने के लिए एक कुशल अवलोकनकर्ता की आवश्यकता होती है। एक अच्छे अवलोकनकर्ता में निम्नांकित प्रमुख गुण पाए जाते हैं-

  1. बुद्धिबल—एक अच्छे अवलोकनकर्ता में बुद्धिबल होना अत्यंत अनिवार्य है। इसी बुद्धिमानी के आधार पर क्ह अपनी समस्या से संबंधित अर्थपूर्ण व वस्तुनिष्ठ सूचनाओं का संकलन करता
  2. विभिन्न साधनों व पद्धतियों का ज्ञान-एक अच्छे अवलोकनकर्ता को शोध कार्य को सफल बनाने के लिए विभिन्न साधनों व पद्धतियों का भी ज्ञान होना अनिवार्य है। वह अनेक अन्य पद्धतियों का प्रयोग सहायक पद्धतियों के रूप में करके अवलोकन द्वारा एकत्रित सूचनाओं को अधिक विश्वसनीय बना सकता है।
  3. सामाजिक जटिलता का ज्ञान-एक अच्छे अवलोकनकर्ता अथवा अनुसंधानकर्ता को सामाजिक व्यवहार तथा सामाजिक घटनाओं की जटिलता का भी पूर्ण ज्ञान होना चाहिए ताकि वह सभी सूचनाएँ एकत्रित कर सके। बिना इस ज्ञान के अधिक अर्थपूर्ण सूचनाएँ एकत्रित नहीं की जा सकतीं।
  4. सामाजिक मनोविज्ञान का ज्ञान-एक अच्छे व कुशल अवलोकनकर्ता का एक अच्छा मनोवैज्ञानिक होना भी अनिवार्य है ताकि वह अवलोकित समूह के सदस्यों को ठीक प्रकार से समझकर तथा उनका विश्वास प्राप्त करके ठीक सूचनाएँ एकत्रित कर सके।
  5. आवश्यक सूचनाओं के संकलन की क्षमता-एक अच्छे अनुसंधानकर्ता को अवलोकित विषय-क्षेत्र तथा समस्या के संबंध में पूर्ण ज्ञान होना चाहिए ताकि वह आवश्यक सूचनाओं का संकलन कर सके।
  6. दूरदर्शिता तथा व्यवहारकुशलता–एक अवलोकनकर्ता को दूरदर्शी होना चाहिए। उसे बहुत हो साच-समझकर कार्य करना चाहिए और अपने व्यवहार को परिस्थितियों के अनुकूल नियंत्रित रखना चाहिए। उसमें इतनी व्यवहारकुशलता होनी चाहिए कि वह दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर सके तथा सदस्यों से पूर्ण सहयोग प्राप्त कर सके।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अगर सभी गुणों से संपन्न व्यक्ति एक कुशल अवलोकनकर्ता अथवा अनुसंधानकर्ता होगा तो वह अवलोकन के दोषों, जिनमें से अधिकांश अवलोकनकर्ता से ही संबंधित हैं, को दूर कर सकता है। आजकल सामूहिक अवलोकन द्वारा यह कार्य संभव हो गया है।

प्रश्न 6.
अवलोकन-पद्धति के गुणों एवं दोषों की विवेचना कीजिए।
या
सामाजिक अन्वेषण में प्रयोग की जाने वाली पद्धति के रूप में अवलोकन के गुण-दोषों की विवेचना कीजिए।
या
समाजशास्त्री अनुसंधान में अवलोकन-पद्धति के महत्त्व की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

अवलोकन का मूल्यांकन

अवलोकन का अर्थ देखना है, अर्थात् आँखों के प्रयोग द्वारा घटनाओं की जाँच-पड़ताल करने की पद्धति को अवलोकन कहा जाता है। यह आँकड़े एकत्रित करने की एक विश्वसनीय एवं प्रामाणिक पद्धति मानी जाती है। अवलोकन का मूल्यांकन इसके गुणों एवं दोषों के आधार पर किया जा सकता है। किसी भी अनुसंधान पद्धति के अपने कुछ गुण तथा सीमाएँ होती हैं। अवलोकन के गुण-दोषों की विवचेना इस प्रकार से की जाती है-

अवलोकन के प्रमुख गुण

अवलोकन पद्धति में पाए जाने वाले प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. सरल अध्ययन–अवलोकन पद्धति का प्रयोग अत्यंत सरल कार्य है। इसमें अनुसंधानकर्ता को आँखों से निरीक्षण-मात्र करना होता है तथा घटना के बारे में तथ्य एकत्रित करने होते हैं। इस प्रकार के कार्य में अन्य किसी प्रकार के साधन की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि सारे तथ्यों का संकलन देखकर किया जाता है, इसलिए अनुसंधानकर्ता तथ्यों के संकलन में भी सफल रहता है।
  2. सही सूचनाओं का संकलन–अवलोकन का अभिप्राय देखना है। व्यक्ति जिस वस्तु को स्वयं देखता है, वह उसके बारे में संपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त ‘आँखों द्वारा देखकर एकत्रित सूचनाएँ अधिक विश्वसनीय होती हैं। किसी सूचनादाता द्वारा बताई गई बातें तो पक्षपातपूर्ण एवं गलत हो सकती हैं, परंतु आँखों द्वारा देखकर एकत्रित सूचनाएँ सदैव सही होती हैं।
  3. पुनः जाँच संभव–अवलोकन द्वारा प्राप्त निष्कर्षों के संबंध में यदि कोई शंका किसी समय होने लगे तो उसकी पुनः जाँच कभी भी की जा सकती है। पुनः जाँच द्वारा पहले से एकत्रित सूचनाओं की प्रामाणिकता को सिद्ध किया जा सकता है तथा तथ्यों की जाँच की जा सकती है।
  4. सार्वभौमिक पद्धति-अवलोकन एक सार्वभौमिक पद्धति है; क्योंकि एक तो इसका प्रयोग सभी विज्ञानों में होता है और दूसरे, विद्वानों का विचार है कि विज्ञान का कार्य अवलोकन द्वारा प्रारम्भ होता है और प्रामाणिकता की जाँच भी अवलोकन द्वारा ही होती है; अतः सभी सामजिक व प्राकृतिक विज्ञानों में ज्ञान प्राप्त करने की प्रथम श्रेणी अवलोकन हीं है और इसलिए इसे एक सार्वभौमिक पद्धति भी माना जाता है।
  5. ज्ञान में आशातीत वृद्धि—-अवलोकन पद्धति द्वारा ज्ञान में आशातीत वृद्धि होती है। हमारे ज्ञान में वृद्धि का प्रमुख स्रोत हमारा दैनिक घटनाओं का अवलोकन ही है। किसी भी वस्तु या दृश्य | को आँखों से देखकर वस्तु या प्रश्न के संबंध में पूर्ण ज्ञान हो सकता है।
  6. सर्वाधिक प्रचलित पद्धति-अवलोकन एक सर्वाधिक प्रचलित पद्धति है; क्योकि कोई भी ऐसा विज्ञान नहीं है जिसमें अवलोकन पद्धति का सर्वप्रथम प्रयोग नहीं किया जाता हो। इस पद्धति का प्रयोग केवल सूचनाएँ एकत्रित करने के लिए ही नहीं किया जाता, अपितु सूचनाओं की प्रामाणिकता की जाँच करने के लिए भी किया जाता है। इसलिए यह सर्वाधिक प्रचलित पद्धति है।
  7. उपकल्पनाओं का निर्माण–अवलोकन पद्धति उपकल्पनाओं के निर्माण का भी एक प्रमुख स्रोत है; क्योंकि अधिकांश उपकल्पनाओं का निर्माण व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ही किया जाता है जो कि हमें अवलोकन द्वारा प्राप्त होता है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अवलोकन सूचनाओं के संकलन एवं संकलित सूचनाओं की प्रामाणिकता की जाँच करने की एक महत्त्वपूर्ण पद्धति है।

अवलोकन के प्रमुख दोष

एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पद्धति होने के बावजूद यह पूर्ण रूप से दोषरहित नहीं है। इसमें पाए जाने वाले प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं-

  1. अवलोकनकर्ता का वैयक्तिक दृष्टिकोण–प्रत्येक व्यक्ति की घटनाओं एवं वास्तविकता को देखने का अपना पृथक् दृष्टिकोण होता है तथा वह इस दृष्टिकोण से,अध्ययन के समय अधिक विमुख नहीं हो सकता। उसका यह वैयक्तिक दृष्टिकोण अवलोकन को अवैज्ञानिक बना देता है। तथा इससे एकत्रित सूचनाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
  2. निष्पक्षता का अभाव-व्यक्ति अपने पूर्वजों की संस्कृति को विरासत में प्राप्त करता है और उसी संस्कृति को जीवन-पर्यंत पालन भी करता है। इसी संस्कृति द्वारा प्राप्त मूल्यों, विश्वासों व मनोवृत्तियों के आधार पर वह घटनाओं का अध्ययन भी करता है। अवलोकन करते समय वह अवलोकित घटना की व्याख्या अपने इन्हीं मूल्यों, मनोवृत्तियों एवं पूर्वाग्रहों के संदर्भ में करता है। जिससे संकलित आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
  3. समय का अपव्यय-अवलोकन पद्धति में अवलोकनकता को घटना का अवलोकन करने के लिए स्वयं घटनास्थल पर जाना पड़ता है। वहाँ अनेक बार जाने व घटना का अवलोकन करने में काफी समय लग जाता है। यदि सहभागी अवलोकन द्वारा सूचना एकत्रित की जा रही है तो अवलोकनकर्ता को समूह के सदस्यों का विश्वास प्राप्त करने में ही काफी समय लग जाता है।।
  4. सदस्यों के व्यवहार में कृत्रिमता–यदि किसी समूह के सदस्यों को यह पता चल जाता है कि कोई अजनबी उनके बीच उपस्थित है और उनके व्यवहार का अवलोकन कर रहा है तो उनके व्यवहार में कृत्रिमता आ जाती है। इस दशा में अवलोकतनकर्ता सदस्यों के वास्तविक व्यवहार के बारे में ज्ञान प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाता।
  5. घटनाओं की अमूर्तता–समाजशास्त्र में अनेक घटनाएँ अमूर्त होती हैं, जिनका अवलोकन संभव नहीं है और इस प्रकार ऐसी घटनाओं के अवलोकन का अवसर अवलोकनकर्ता को प्राप्त ही नहीं होता है।
  6. घटनास्थल से दूरी-अवलोकन पद्धति का एक अन्य दोष अवलोकनकर्ता की घटनास्थल से दूरी है। क्योंकि पहले से यह पता नहीं होता है कि कौन-सी घटना कैब, कहाँ और किस रूप में घटित होगी, इसलिए अवलोकनकर्ता समय पर पहुँचकर उसका अध्ययन नहीं कर सकता।।
  7. घटनाओं की अनिश्चितता–घटनाओं के घटने के समय व स्थान निश्चित नहीं होते हैं। इसलिए अवलोकनकर्ता अधिकतर प्राथमिक स्तर पर आँकड़े एकत्रित करने में सफल नहीं हो पाता है। अनिश्चितता के कारण वह उनके संबंध में पूर्वानुमान नहीं लगा सकता है।
  8. भूतकालीन घटनाओं का अध्ययन अंसभव—अवलोकन पद्धति द्वारा भूतकालीन घटनाओं का अध्ययन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अतीत की घटनाओं को देखा नहीं जा सकता। अतः अवलोकन का प्रयोग केवल सीमित परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
  9. ज्ञानेंद्रियों की अपूर्ण क्षमता-ज्ञानेंद्रियों की क्षमता का पूर्ण न होना भी अवलोकन पद्धति का एक प्रमुख दोष है। यदि किसी घटना के कुछ पहलुओं को अवलोकनकर्ता देख न पाए अथवा जो वह देख रहा है उसे अर्थपूर्ण ढंग से समझ न सके तो प्राप्त सूचनाएँ दोषपूर्ण हो सकती हैं।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अवलोकन एक महत्त्वपूर्ण पद्धति है, परंतु फिर भी यह पूरी तरह दोषरहित नहीं है। यदि दोषों को अवलोकनकर्ता के स्तर पर नियंत्रित करके कम कर दिया जाए तो यह एक अच्छी व अत्यंत विश्वसनीय पद्धति हो सकती है।

प्रश्न 7.
सामाजिक सर्वेक्षण के प्रमुख प्रकारों की विवचेना कीजिए।
उत्तर

सामाजिक सर्वेक्षणों के प्रकार

आज सामाजिक सर्वेक्षणों का विषय-क्षेत्र इतना अधिक विस्तृत है कि सामाजिक सर्वेक्षणों के कितने प्रकार हैं, यह बताना कठिन हो गया है। उद्देश्यों, विषय-वस्तु, प्रकृति एवं समयावधि के अनुसार सामाजिक सर्वेक्षणों का वर्गीकरण करने का प्रयास किया गया है।
वेल्स (Wells) ने सामाजिक सर्वेक्षणों को दो श्रेणियों में विभाजित किया है-

  1. प्रचार सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षण सामान्यत: सरकारी योजनाओं अथवा सरकार द्वारा बनाए गए सामाजिक विधानों का प्रचार करने के उद्देश्य से किए जाते हैं। अन्य शब्दों में, इनका उद्देश्यं जनता में किसी बात के बारे में जागृति पैदा करना होता है।।
  2. तथ्य संकलन सर्वेक्षण—इस प्रकार के सर्वेक्षणों का उद्देश्य सामाजिक जीवन अथवा सामाजिक घटनाओं के बारे में तथ्यों का पता लगाना होता है। अगर इस कार्य में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है तो ऐसे सर्वेक्षण ‘वैज्ञानिक सर्वेक्षण’ कहे जाते हैं। अगर तथ्यों के संकलन के आधार पर किसी समस्या का समाधान बताना है तो ऐसे सर्वेक्षण व्यावहारिक सर्वेक्षण कहे जाते हैं।

यंग (Young) ने सामाजिक सर्वेक्षणों के निम्नांकित दो प्रकारों का उल्लेख किया है-

  1. प्रसंगात्मक सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षणों का उद्देश्य सामाजिक जीवन के किसी एक पक्ष (जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक स्थिति आदि) के बारे में सूचना प्राप्त करना होता है। क्योंकि | ऐसे सर्वेक्षणों का एक ही प्रसंग होता है, इसलिए इन्हें प्रसंगात्मक सर्वेक्षण कहा जता है।।
  2. सामान्य सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षण बहुपक्षीय विस्तृत अध्ययन पर आधारित होते हैं। राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा इस प्रकार के सर्वेक्षण अधिकतर किए जाते हैं। इन सर्वेक्षणों का उद्देश्य व्यक्तियों के सामान्य जीवन को समझना होता है।

हाइमन (Hyman) ने सामाजिक सर्वेक्षणों को निम्नलिखित दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है-

  1. वर्णनात्मक सर्वेक्षण—इस प्रकार के सर्वेक्षणों को ‘विवरणात्मक सर्वेक्षण’ भी कहा जाता है, क्योंकि इनका उद्देश्य सामाजिक जीवन, सामाजिक घटना, सामाजिक दशा अथवा सामाजिक प्रक्रिया का विवरण प्राप्त करना होता है। इन सर्वेक्षणों में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता
  2. अन्वेषणात्मक सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षणों को व्याख्यात्मक सर्वेक्षण’ भी कहा जाता है; क्योंकि इनमें किसी घटना के विभिन्न कारकों की व्याख्या करने का प्रयास किया जाता है। अगर इनको उद्देश्य किसी कार्यक्रम का मूल्यांकन करना है तथा उसे प्रभावित करने वाले कारकों का पता लगाना है तो ऐसे सर्वेक्षण को ‘कार्यक्रम संबंधी सर्वेक्षण’ कहा जाता है। अगर सर्वेक्षण का उद्देश्य किसी समस्या के कारणों का पता लगाकर उसका निदान बताना है तो । ऐसे सर्वेक्षण को ‘निदानात्मक सर्वेक्षण’ कहा जाता है। अगर सर्वेक्षण का उद्देश्य भावी नीति बनाना है तो उसे ‘भविष्य निर्देशित सर्वेक्षण’ कहा जाता है। कुछ सर्वेक्षण ऐसे भी होते हैं, जिनका उद्देश्य पहले से किए गए सर्वेक्षणों से प्राप्त जानकारी की सत्यता की जाँच करना होता है। ऐसे सर्वेक्षणों को द्वितीयक सर्वेक्षण’ कहा जाता है।

सर्वेक्षणों को प्रकृति, उद्देश्यों एवं विषय-वस्तु के आधार पर निम्नांकित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. जनगणना सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षण संपूर्ण समाज अथवा संपूर्ण समुदाय की इकाइयों का अध्ययन करते हैं। भारत में हर दस वर्ष बाद होने वाली जनगणना इस प्रकार के सर्वेक्षण का ही उदाहरण है।
  2. निदर्शन सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षण में संपूर्ण समाज अथवा समुदाय का अध्ययन न करके उनका प्रतिनिधित्व करने वाली इकाइयों का अध्ययन किया जाता है। आजकले अधिकांश सर्वेक्षण निदर्शन पर ही आधारित होते हैं।
  3. मूल्यांकन सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षणों का उद्देश्य सामाजिक जीवन अथवा सामाजिक घटना के विभिन्न पक्षों का मूल्यांकन करना होता है।
  4. मनोवृत्ति सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षणों का उद्देश्य किसी समस्या अथवा घटना के बारे में – लोगों की मनोवृत्तियों का पता लगाना होता है।

उपर्युक्त सर्वेक्षणों के अतिरिक्त ग्रामीण सर्वेक्षण, नगरीय सर्वेक्षण, सरकारी सर्वेक्षण, अर्द्ध-सरकारी सर्वेक्षण, गैर-सरकारी सर्वेक्षण, गोपनीय सर्वेक्षण, सहकारी सर्वेक्षण, गुणात्मक सर्वेक्षण, गणनात्मक सर्वेक्षण, सामान्य सर्वेक्षण, विशिष्ट सर्वेक्षण, नियमित सर्वेक्षण, कार्यवाहक सर्वेक्षण, अंतिम सर्वेक्षण आदि सर्वेक्षणों का भी प्रयोग आधुनिक समाजों में किया जाने लगा है।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र में अनेक प्रकार के सर्वेक्षणों का प्रयोग किया जाता है। वस्तुतः सर्वेक्षणों का प्रयोग समाजशास्त्र तक ही सीमित नहीं है। लगभग सभी विषयों में सर्वेक्षणों का किसी-न-किसी रूप में प्रयोग किया जाने लगा है।

प्रश्न 8.
सामाजिक सर्वेक्षण किसे कहते हैं? इसके प्रमुख उद्देश्य बताइए।
या
सामाजिक सर्वेक्षण की परिभाषा दीजिए तथा इसकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
या
सामाजिक सर्वेक्षण से आप क्या समझते हैं। इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण आज के वैज्ञानिक युग की एक प्रमुख विशेषता है। यह वैज्ञानिक अध्ययन की एक प्रमुख पद्धति है जिसके द्वारा सामाजिक जीवन, सामाजिक संबंधों अथवा सामाजिक दशाओं की बड़ी सावधानीपूर्वक जाँच-पड़ताल की जाती है। इस जाँच-पड़ताल का उद्देश्य सामाजिक जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त करके उसे अधिक सार्थक बनाना है। साथ ही इसका उद्देश्य सामाजिक दशाओं, घटनाओं एवं समस्याओं से संबंधित सामग्री का संकलन करना है तथा इनका आलोचनात्मक निरीक्षण करना है। सामाजिक सर्वेक्षण कोई आधुनिक बात नहीं है अपितु इसका इतिहास काफी लंबा रहा है। वस्तुतः सामाजिक सर्वेक्षण ने मानव सभ्यता का विकास करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सामाजिक सर्वेक्षण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

‘सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक अनुसंधान की एक प्रमुख पद्धति मानी जाती है। सर्वेक्षण’ को अंग्रेजी , में ‘सर्वे’ (Survey) कहा जाता है, जो दो शब्दों से बना है-‘सर’ (sur) अथवा ‘सोर’ (sor) ‘वियर’ (veeir or veoir)। प्रथम शब्द का अर्थ ‘ऊपर’ (over) है जबकि दूसरे शब्द का अर्थ ‘देखना’ (see) है, अर्थात् ‘सर्वेक्षण’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘किसी घटना को ऊपर से देखना’ है। इस प्रकार ‘सामाजिक सर्वेक्षण’ का अर्थ हुआ ‘किसी सामाजिक घटना को ऊपर से देखना।’ परंतु ‘सामाजिक सर्वेक्षण’ शब्द का प्रयोग आज विशेष अर्थ में किया जाता है। इसका अर्थ सामाजिक अनुसंधान की उस पद्धति से है, जिसके द्वारा अनुसंधानकर्ता घटना स्थल पर जाकर उसका वैज्ञानिक रूप में अवलोकन करता है तथा उसके संबंध में जानकारी प्राप्त करता है।

प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है-
यांग (Yang) के अनुसार-“सामाजिक सर्वेक्षण सामान्यतया लोगों के एक समूह की रचना, क्रियाओं तथा रहन-सहन की दशाओं में छानबीन है।”

मोजर (Moser) के अनुसार-“समाजशास्त्रियों को सामाजिक सर्वेक्षण को एक तरीके, जो अत्यधिक व्यवस्थित है, के रूप में देखना चाहिए, जिसके द्वारा किसी क्षेत्र की खोज करने तथा अध्ययन विषय से प्रत्यक्ष संबंध रखने वाली सूचनाएँ एकत्रित करने में उपयोगी है जिससे समस्या पर प्रकाश पड़ता है और आवश्यक सुझावों की ओर संकेत किया जाता है।”

केलाँग (Kellong) के अनुसार-“सामाजिक सर्वेक्षण सामान्यतया वे सहकारी प्रयास माने गए हैं, जो वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग ऐसी सामाजिक समस्याओं के अध्ययन में करते हैं, जो इतनी गंभीर हैं कि जनमत को तथा समस्या के समाधान की इच्छा को जाग्रत करती हैं।”

बर्गेस (Burgess) के अनुसार-“एक समुदाय का सर्वेक्षण एवं सामाजिक विकास एक रचनात्मक योजना प्रस्तुत करने के उद्देश्य से किया गया उसे समुदाय की दशाओं और आवश्यकताओं का वैज्ञानिक अध्ययन है।”

अब्रामस (Abrams) के अनुसार—“सामाजिक सर्वेक्षण एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक समुदाय की संरचना एवं क्रियाओं के सामाजिक पहलुओं के बारे में संख्यात्मक तथ्य एकत्रित किए जाते हैं।”

बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार-“एक सामाजिक सर्वेक्षण किसी विशेष क्षेत्र के लोगों के रहन-सहन तथा कार्य करने की दशाओं से संबंधित तथ्य एकत्रित करने को कहते हैं।’

यंग (Young) के अनुसार-“सामाजिक सर्वेक्षण

  1. किसी सुधार की क्रियात्मक योजना के निरूपण और
  2.  निश्चित भौगोलिक सीमाओं में व्याप्त तथा निश्चित सामाजिक परिणामों और महत्त्व की किसी प्रचलित यो तात्कालिक व्याधिकीय अवस्था के सुधार से संबंधित है,
  3. इन अवस्थाओं की माप व तुलना किन्हीं ऐसी परिस्थितियों के साथ हो सके जो कि आदर्श रूप में स्वीकार की जाती हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक सर्वेक्षण को समुदाय के सामान्य जीवन के अध्ययन के रूप में, सामाजिक समस्याओं व समाज सुधार के रूप में तथा एक वैज्ञानिक पद्धति के रूप में परिभाषित किया गया है। अधिकांशतः इसे वैज्ञानिक अन्वेषण की एक शाखा के रूप में देखा जाता है। इसके अंतर्गत निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करने वाली वृहत् एवं कम आकार वाली जनसंख्याओं (समग्रों) की जीवन दशाओं, क्रियाओं; समस्याओं तथा व्याधिकीय दशाओं का अध्ययन किया जाता है ताकि समाज सुधार एवं सामाजिक प्रगति हेतु रचनात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा सकें।

सामाजिक सर्वेक्षण की प्रमुख विशेषताएँ

सामाजिक सर्वेक्षण की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. निश्चित पद्धति–सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक जीवन एवं सामाजिक समस्याओं के अध्ययन की एक निश्चित पद्धति है।।
  2. वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग-सामाजिक सर्वेक्षण में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है, | जिससे अध्ययन वस्तु के संबंध में किसी प्रकार के पक्षपात की संभावना नहीं रहती।
  3. सामाजिक पक्षों का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण के अंतर्गत सामान्यतः किसी समुदाय की संरचना, उसमें रहने वाले व्यक्तियों की जीवन दशाओं तथा उनकी क्रियाओं के सामाजिक पक्षों का अध्ययन किया जाता है। कई बार इसमें आर्थिक एवं सांस्कृतिक पक्षों को भी सम्मिलित किया जाता है।
  4. निश्चित भौगोलिक क्षेत्र–सामाजिक सर्वेक्षण का संबंध एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित होता है। अन्य शब्दों में, सर्वेक्षण के लिए किसी क्षेत्र-विशेष में रहने वाले व्यक्तियों का अध्ययन हेतु चयन किया जाना अनिवार्य है।
  5. प्रत्यक्ष एवं मूर्त पहलुओं का अध्ययन सामाजिक सर्वेक्षण में सामाजिक जीवन के प्रत्यक्ष एवं ।। मूर्त पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
  6. वस्तुनिष्ठ, तटस्थ तथा पक्षपातरहित अध्ययन सामाजिक सर्वेक्षण का संबंध सामाजिक जीवन के वस्तुनिष्ठ, तटस्थ तथा पक्षपातरहित अध्ययन से है। यह वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग के कारण संभव हो पाता है।
  7. सामाजिक समस्याओं के अध्ययन पर बल–सामाजिक सर्वेक्षण के अंतर्गत सामाजिक समस्याओं के अध्ययन पर बल दिया जाता है। ये समस्याएँ व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामुदायिक, सामाजिक, स्थानीय, राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हो सकती हैं।
  8. सहकारी अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण मुख्य रूप से सहकारी अध्ययन होता है, क्योंकि इसमें एक से अधिक सर्वेक्षणकर्ता अध्ययन क्षेत्र में जाकर चुने हुए सूचनादाताओं से सूचनाएँ एकत्रित करते हैं।
  9. सुधारात्मक प्रकृति-सामाजिक सर्वेक्षण की प्रकृति सुधारात्मक होती है, अर्थात् इसका प्रयोग मुख्य रूप से सामाजिक सुधार अथवा सामाजिक प्रगति हेतु किया जाता है। अन्य शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि सामाजिक सर्वेक्षण रचनात्मक जीवन से संबंधित होता है।
  10. तुलनात्मक अध्ययन-सामाजिक सर्वेक्षण के अंतर्गत सामाजिक जीवन तथा सामाजिक घटनाओं के तुलनात्मक अध्ययन पर बल दिया जाता है।

सामाजिक सर्वेक्षण के उद्देश्य एवं महत्त्व

आधुनिक युग में सामाजिक सर्वेक्षण का महत्त्व निरंतर बढ़ता जा रही है। इसके महत्त्व को इसके . निम्नलिखित उद्देश्यों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. तथ्यों का संकलन--सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य अध्ययन हेतु चुने गए सूचनादाताओं से उनके सामाजिक जीवन अथवा सामाजिक समस्या के संबंध में तथ्यों का संकलन करना है। उदाहरणार्थ-अगर सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य गंदी बस्तियों में रहने वाले लोगों की जीवन दशाओं का अध्ययन करना है तो हम चयनित गंदी बस्ती में रहने वालों से उन्हीं के बारे में तथ्यों का संकलन करने का प्रयास करते हैं।
  2. समस्याओं का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य अधिकतर उपयोगितावादी होता है, क्योंकि इसके द्वारा सामाजिक एवं व्यावहारिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है तथा उनके समाधान हेतु रचनात्मक कार्यक्रम बनाए जाते हैं। प्रत्येक समाज में निर्धनता, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, अपराध, बाल अपराध आदि विविध प्रकार की समस्याएँ पाई जाती हैं जो कि समाज की स्थिरता एवं निरंतरता को चुनौती देती रहती हैं। इन समस्याओं का अध्ययन सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा ही किया जाता है।
  3. कार्य-कारण संबंधों की खोज–सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक समस्याओं के कारणों तथा उनके परिणामों का अध्ययन करने में सहायक है। किसी समस्या का समाधान तब तक संभव नहीं है, जब तक कि हमें उसके कारणों का विस्तृत ज्ञान न हो। सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा सामाजिक समस्याओं की उत्पत्ति के कारणों तथा समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का पता लगाया जाता है। इस ज्ञान को सामाजिक, समस्याओं के निराकरण हेतु प्रयोग में लाया जाता है।
  4. जनसाधारण की भावनाओं का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य समाज में प्रचलित विवादों, संस्थाओं, कुप्रथाओं तथा प्रगतिशील योजनाओं के बारे में जनसाधारण की भावनाओं का पता लगाना है। इससे हम जनसाधारण की रुचियों अथवा किसी विकास नीति के बारे में प्रतिक्रियाओं का अध्ययन भी कर सकते हैं।
  5. श्रमिक वर्गों का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण का प्रयोग मुख्य रूप से श्रमिक वर्गों की जीवन दशाओं तथा समस्याओं का अध्ययन करने के लिए ही किया गया है। वास्तव में, सामाजिक सर्वेक्षण की उत्पत्ति ही ऐसे अध्ययनों से हुई है। इन अध्ययनों के आधार पर श्रमिकों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान हेतु कार्यक्रम बनाए जाते हैं। कुछ समाजशास्त्री तो सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य ही श्रमिक वर्गों की समस्याओं का अध्ययन करना बताते हैं।
  6. उपकल्पनाओं का निर्माण एवं परीक्षण सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य उपकल्पनाओं के निर्माण में सहायता प्रदान करना है। सामाजिक सर्वेक्षण उपकल्पनाओं की सत्यता की जाँच करने में भी सहायक है। यद्यपि उपकल्पना का निर्मण करना सामाजिक सर्वेक्षण का अनिवार्य चरण नहीं है, तथापि अधिकांश सर्वेक्षणों में अध्ययन को अधिक निर्देशित करने हेतु उपक़ल्पनाओं का निर्माण किया जाता है।
  7. सामाजिक सिद्धांतों का परीक्षण–मानव व्यवहार परिवर्तनशील है। जैसे-जैसे समाज में परिवर्तन होता है, व्यवहार के बारे में पूर्व-निर्मित सिद्धांतों के परीक्षण की आवश्यकता महसूस की जाने लगती है। इस कार्य में सामाजिक सर्वेक्षण सहायता प्रदान करता है तथा सामाजिक सिद्धांतों का परीक्षण करके उनमें सुधार एवं संशोधन करता है।
  8. सामाजिक नियोजन में सहायक–सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त किया गया ज्ञान सामाजिक नियोजन में सहायता प्रदान करता है। इसके द्वारा विभिन्न विकास योजनाओं का मूल्यांकन भी किया जाता है जिससे नियोजन के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं का पता चल सके तथा उन्हें समय रहते दूर किया जा सके।
  9. नीति-निर्धारण एवं मार्गदर्शन में सहायक–सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा समाज के विभिन्न पक्षों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है। यह जानकारी नीति-निर्धारण तथा समाज को अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में मार्गदर्शन का कार्य करती है।
  10. पूर्वानुमान में सहायक–सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा विभिन्न सामाजिक घटनाओं एवं सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों में पाए जाने वाले कार्य-कारण संबंधों की खोज की जाती है। जो जानकारी इनके बारे में प्राप्त होती है, उसके आधार पर सर्वेक्षणकर्ता पूर्वानुमान लगाने का प्रयास करता है। अनेक बाजार सर्वेक्षणों को उद्देश्य आने वाले समय में किसी विशेष वस्तु की बिक्री का अनुमान लगाना होता है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक सर्वेक्षण आज के आधुनिक युग में अपने महत्त्व के कारण अत्यधिक लोकप्रिय होता जा रहा है। वास्तव में यह इतने उद्देश्यों की पूर्ति करता है। कि जीवन के किसी भी पक्ष में आज सामाजिक सर्वेक्षणों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
साक्षात्कार के प्रमुख प्रकारों की विवचेना कीजिए।
या
सामाजिक शोध में साक्षात्कार के जिन प्रकारों का प्रयोग किया जाता है उनकी संक्षिप्त विवचेना कीजिए।
उत्तर
साक्षात्कार के विभिन्न प्रकार सामाजिक अनुसंधान में साक्षात्कार पद्धति का प्रयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है। इसका प्रमुख रूप से वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया गया है। वर्गीकरण के प्रमुख आधार तथा उनके अनुरूप, साक्षात्कार के प्रकार अग्रलिखित हैं-
(अ) उद्देश्यों या कार्यों के आधार पर वर्गीकरण
उद्देश्यों तथा कार्यों के आधार पर साक्षात्कार को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. कारक-परीक्षक साक्षात्कार-इस प्रकार के साक्षात्कार में गंभीर सामाजिक घटना के कारणों की समीक्षा की जाती है। समाज में घटित होने वाली विभिन्न घटनाओं अथवा परिस्थितियों के कुछ विशेष कारक या तत्त्व होते हैं। इन कारकों की खोज करना ही कारक-परीक्षक साक्षात्कार का प्रमुख उद्देश्य है।।
  2. उपचार-संबंधी साक्षात्कार-समाज में, चाहे वह आदिम हो या आधुनिक, किसी-न-किसी प्रकार की समस्याएँ रहती ही हैं। उपचार संबंधी साक्षात्कार इसी प्रकार की समस्याओं को दूर करने के उपायों की खोज से संबंधित है। इस प्रकार के साक्षात्कार में, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, अनुसंधानकर्ता का उद्देश्य किसी समस्या का उपचार करना होता है।
  3. अनुसंधान-संबंधी साक्षात्कार–इस प्रकार के साक्षात्कार का उद्देश्य नवीन ज्ञान की खोज करना है। यह नवीन ज्ञान सामाजिक समस्याओं और सामाजिक घटनाओं से संबंधित होता है। अनुसंधान-संबंधी साक्षात्कार में विषयों एवं घटनाओं से संबंधित तथ्यों तथा कारकों की खोज की जाती है। इस प्रकार के साक्षात्कार का उद्देश्य पहले दोनों प्रकार के साक्षात्कारों से विस्तृत है।

(ब) औपचारिकता के आधार पर वर्गीकरण
औपचारिकता के आधार पर साक्षात्कार को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. औपचारिक साक्षात्कार–इस प्रकार के साक्षात्कार को नियंत्रित साक्षात्कार’ भी कहते हैं। इसमें अनुसंधानकर्ता साक्षात्कारदाता से पूर्वनिश्चित प्रश्नों को ही पूछ सकता है। इन प्रश्नों को पूछने में अनुसंधानकर्ता किसी प्रकार का संशोधन नहीं कर सकता और न ही इन प्रश्नों से हटकर दूसरे प्रश्न पूछ सकता है। इसे संचालित साक्षात्कार’, ‘व्यवस्थित साक्षात्कार’ अथवा ‘नियोजित साक्षात्कार’ भी कहा जा सकता है।
  2. अनौपचारिक साक्षात्कार-अनौपचारिक साक्षात्कार को ‘अनियंत्रित साक्षात्कार , ‘असंचालित साक्षात्कार’, ‘अव्यवस्थित साक्षात्कार’ अथवा ‘नियोजित साक्षात्कार’ भी कहा जाता है। इसमें साक्षात्कारकर्ता पर किसी प्रकार के पूर्वनिर्मित प्रश्नों को पूछने का कोई नियंत्रण नहीं होता और साक्षात्कारदाता भी प्रश्नों के उत्तर स्वतंत्र रूप से देता है। यह एक प्रकार से मुक्त वार्तालाप के रूप में होता है, जिसमें अनुसंधानकर्ता सूचनादाता से समस्या के विभिन्न पहलुओं पर सूचना प्राप्त करने का प्रयास करता है।

(स) उत्तरदाताओं की संख्या के आधार पर वर्गीकरण
उत्तरदाताओं की संख्या के आधार पर साक्षात्कार के निम्नलिखित दो प्रकार हैं-

  1. व्यक्तिगत साक्षात्कार–व्यक्तिगत साक्षात्कार में, जैसाकि इसके नाम से ही स्पष्ट है, किसी व्यक्ति के बारे में विस्तृत सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। इसमें सूचनादाता से औपचारिक अथवा अनौपचारिक रूप से समस्या की प्रकृति के अनुकूल एक के बाद एक प्रश्न पूछा जाता है। इस प्रकार के साक्षात्कार में केवल सूचनादाता और अंवेषणकर्ता ही उपस्थित रहते हैं।
  2. सामूहिक साक्षात्कार–व्यक्तिगत साक्षात्कार के विपरीत सामूहिक साक्षात्कार, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, एक ही समय में अनेक सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने से संबंधित साक्षात्कार है। इसमें व्यक्तिगत साक्षात्कार के दोष समाप्त हो जाते हैं। जब एक सदस्य उत्तर देता है तो अन्य सदस्य उसकी पुष्टि करते हैं। इस प्रकार के साक्षात्कार से प्राप्त सूचनाएँ अधिक विश्वसनीय मानी जाती हैं।

(द) अध्ययन-पद्धति के आधार पर वर्गीकरण
अध्ययन-पद्धति के आधार पर साक्षात्कार को निम्नांकित चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. गैर-निर्देशित साक्षात्कार—यह साक्षात्कार अनियंत्रित अथवा अनौपचारिक साक्षात्कार के समान है। इस प्रकार के साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता अथवा उत्तरदाता पर न तो किसी प्रकार का नियंत्रण ही होता है और न ही पहले से निर्मित कोई प्रश्नावली इत्यादि। साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता को विषये के संबंध में एक कहानी के रूप में अपने मनोभाव व्यक्त करने के लिए प्रेरित करता है और सूचनादाता स्वतंत्र रूप से उसका विवरण प्रस्तुत करता है। यह स्वतंत्र एवं मुक्त प्रकार का वार्तालाप है।
  2. केंद्रित साक्षात्कार-इस प्रकार का साक्षात्कार उत्तरदाता की उन परिस्थितियों के संबंध में | किया जाता है, जिनमें उत्तरदाता पहले रह चुका हो। इस प्रकार के साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता। का ध्यान उसी परिस्थिति पर केंद्रित रहता है, जिसका पूर्वज्ञान साक्षात्कारदाता को है। साक्षात्कारकर्ता यह जानने का प्रयास करता है कि अमुक परिस्थिति का उत्तरदाता पर क्या प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार के साक्षात्कार को केंद्रित साक्षात्कार इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें किसी घटना या इसके किसी विशेष अंमं पर ही ध्यान केंदित करके प्रश्न पूछे जाते हैं। उदाहरण के लिए एक साक्षात्कारदाता ने कोई फिल्म देखी है; तो साक्षात्कारकर्ता केंद्रित साक्षात्कार में यह जानने का प्रयास करता है कि साक्षात्कारदाता पर उस फिल्म का क्या प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार के साक्षात्कार में अनुसंधानकर्ता साक्षात्कारदाता को किसी प्रकार का कोई निर्देश नहीं देता, वह निश्चित विषय या परिस्थिति के अतिरिक्त अन्य किसी विषय या । परिस्थिति में केंद्रित नहीं रहता। इसके अतिरिक्त, इसमें साक्षात्कारक़र्ता विषय का व्यक्तिगत रूप से गहन अध्ययन करता है। इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग रोबर्ट के० मर्टन ने रेडियो के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किया था। आज केंद्रित साक्षात्कार, जनसंचार अनुसंधान में एक प्रमुख प्रविधि बन चुका है।
  3. पुनरावृत्ति साक्षात्कार—यह साक्षात्कार, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, एक से अधिक बार साक्षात्कार करने से संबंधित है। जब सूचनादाताओं से एक से अधिक बार साक्षात्कार करके सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं तो उसे पुनरावृत्ति साक्षात्कार कहा जाता है। इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग अधिकतर व्यक्तियों के मूल्यों एवं मनोवृत्तियों में होने वाले परिवर्तनों के अध्ययनों के लिए किया जाता है। यदि कुछ चुने हुए सूचनादाताओं (निश्चित संख्या में) से एक से अधिक बार साक्षात्कार करके सूचना एकत्रित की जाती है तो उसे हम ‘पैनल (Panel) अध्ययन’ कहते हैं।
  4. गहन साक्षात्कार–इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग वैयक्तिक अध्ययन तथा ऐसे अन्य अध्ययनों में किया जाता है, जिनमें अत्यधिक विस्तृत व गहन सूचनाएँ एकत्रित करनी होती हैं। इसमें औपचारिक साक्षात्कार द्वारा संबंधित घटना के बारे में (उसके सभी पक्षों के बारे में) गहन व विस्तृत सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं। सामाजिक समस्याओं की प्रकृति जानने के लिए भी इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग किया जाता है।

साक्षात्कार के उपर्युक्त प्रकारों के अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने अल्पकालीन साक्षात्कार’ तथा ‘दीर्घकालीन साक्षात्कार का भी उल्लेख किया है। अल्पकालीन साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता एक बार में सबसे सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास करता है और सभी कार्य थोड़े ही समय में पूरा करता है। इसके विपरीत, दीर्घकालीन साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता को उत्तरदाता के पास कई बार जाना पड़ता है।

और सूचना प्राप्ति का कार्य देर तक करना पड़ता है। निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि, साक्षात्कार पद्धति में साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता के आमने-सामने की परिस्थति में सूचना प्राप्त करने का प्रयास करता है।

इसके विविध प्रकार हैं, परंतु अधिकांशत: औपचारिक एवं अनौपचारिक साक्षात्कार का ही प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 10.
साक्षात्कार क्या है? साक्षात्कार के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना कीजिए।
या
साक्षात्कार से आप क्या समझते हैं? सामाजिक अनुसंधान की प्रविधि के रूप में साक्षात्कार के उद्देश्य बताइए।
उत्तर
सामाजिक अनुसंधान की पद्धतियों में सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली पद्धति साक्षात्कार है। आज यह एक सर्वप्रचलित एवं सर्वोपरि पद्धति मानी जाती है तथा मुख्य रूप में प्रयोग होने के साथ-साथ यह अन्य पद्धतियों (जैसे अवलोकन, अनुसूची इत्यादि) में एक सहायक पद्धति या पूरक पद्धति के रूप में भी प्रयोग होती है। इसमें अंवेषणकर्ता सूचनादाता से आमने-सामने की परिस्थिति में समस्या से संबंधित प्रश्न पूछता है और उनके उत्तर प्राप्त करता है। इससे सूचनादाताओं की मनोवृत्तियों एवं दृष्टिकोणों का भी पता चल जाता है।

साक्षात्कार का अर्थ एवं परिभाषाएँ

साक्षात्कार का अर्थ कार्यकर्ता तथा उत्तरदाता के बीच आमने-सामने सम्पर्क स्थापित करके कुछ ऐसे रहस्यों का पता लगाना या उनकी जानकारी प्राप्त करना है, जिनको उत्तरदाता के अतिरिक्त कोई नहीं जानता। इस प्रकार की जानकारी अन्य किसी प्रविधि के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। इस प्रकार की जानकारी प्रायः प्रत्यक्ष रूप में प्रश्नोत्तरी प्रणाली द्वारा की जाती है। उत्तरदाता से कार्यकर्ता सामने बैठकर प्रश्न पूछता है और कार्यकर्ता उत्तरदाता द्वारा दिए गए कुछ उत्तरों को नोट कर लेता है तथा शेष जानकारी मौखिक रूष से ही प्रापत कर ली जाती है।
प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्न प्रकार से परिभाषित किया है-

गुड एवं हैट (Goode and Hatt) के अनुसार-“साक्षात्कार मौखिक रूप से सामाजिक अंत:क्रिया की एक प्रक्रिया है।”

पी०वी० यंग (PV. Young) के अनुसार-“साक्षात्कार को एक व्यवस्थित पद्धति माना जा सकता है, जिसके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के आंतरिक जीवन में अधिक या कम कल्पनात्मक रूप से प्रवेश करता है, जो साधारणतया उसके लिए तुलनात्मक दृष्टि से अपरिचित है।”

वी०एम० पामर (VM. Palmer) के अनुसार-“साक्षात्कार दो व्यक्तियों में सामाजिक स्थिति बताता है, जिनमें निहित मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के लिए यह आवश्यक है कि दोनों व्यक्ति परस्पर प्रत्युत्तर करते रहें, यद्यपि साक्षात्कार में सामाजिक खोज के उद्देश्य से संबंधित दलों से बहुत भिन्न प्रत्युत्तर प्राप्त होते हैं।”

एम०एन० बसु (M.N. Basu) के अनुसार-“एक साक्षात्कार को कुछ विषयों पर व्यक्तियों के आमने-सामने की भेंट के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

सी०ए० मोजर (C.A. Moser) के अनुसार-“औपचारिक साक्षात्कार, जिसमें कि पहले से निर्मित प्रश्नों को पूछा जाता है तथा उत्तरों को प्रमाणीकृत रूप में संकलित किया जाता है, बड़े सर्वेक्षणों में निश्चित रूप से सामान्य है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि साक्षात्कार सामाजिक अनुसंधान की वह पद्धति है, जिसके द्वारा साक्षात्कारकर्ता वार्तालाप के द्वारा सूचनादाता के विचारों और भावनाओं में प्रवेश करके तथ्यों का संकलन करता है। यह साक्षात्कारकर्ता एवं सूचनादाता के बीच आमने-सामने की मीटिंग है, जो साक्षात्कारकर्ता को सूचनादाता के मन के भीतर छिपे विचारों को जानने में भी सहायता प्रदान करती है।

साक्षात्कार के प्रमुख उद्देश्य

साक्षात्कार पद्धति का प्रयोग विविध प्रकार के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। इसके प्रमुख उद्देश्य अग्रलिखित हैं-

  1. प्रत्यक्ष संपर्क साक्षात्कार का सबसे प्रमुख उद्देश्य साक्षात्कारकर्ता का सूचनादाता से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करना है जिससे उस अनुसंधान समस्या से परिचित कराकर उससे सहयोग लिया | जा सके। प्रत्यक्ष संपर्क अधिक विश्वसनीय सूचनाएँ एकत्रित करने में सहायक है।
  2. व्यक्तिगत सूचनाएँ-साक्षात्कार का दूसरा प्रमुख उद्देश्य सूचनादाता से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करके उससे समस्या एवं उसकी पृष्ठभूमि के बारे में व्यक्तिगत सूचनाएँ प्राप्त करना है। इसमें | साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता की भावनाओं को भी जानने का प्रयास करता है।
  3. पूर्ण जानकारी–साक्षात्कार का एक अन्य उद्देश्य सूचनादाताओं से अनुसंधान की समस्या के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त करना है। कई बार साक्षात्कार अनौपचारिक वार्तालाप के रूप में होता है, जिसमें सूचनादाता काफी जानकारी दे देते हैं।
  4. विभिन्न पहलुओं की जानकारी-साक्षात्कार का उद्देश्य विभिन्न प्रकार के पहलुओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त कर समस्या की प्रकृति को ठीक प्रकार से समझने में सहायता प्रदान करना है। साक्षात्कार के विभिन्न प्रकार; जैसे-केंद्रित साक्षात्कार, औपचारिक व अनौपचारिक साक्षात्कार इत्यादि; समस्या के सभी पहलुओं के विषय में जानकारी प्रदान करने में सहायता प्रदान करते हैं।
  5. अवलोकन संभव-साक्षात्कार का एक उद्देश्य अवलोकन को भी संभव बनाना है। साक्षात्कार के समय साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता से समस्या के बारे में बातचीत ही नहीं करता, अपितु उसके चेहरे पर आने वाले मनोभावों से उसके द्वारा बताई गई सूचना की सत्यता के बारे में अनुमान भी लगता है; अतः इसमें अवलोकने प्रविधि एक पूरक प्रविधि की भूमिका निभाती है।
  6. आंतरिक भावनाओं का ज्ञान–साक्षात्कार का एक अन्य उद्देश्य सूचनादाताओं की आंतरिक भावनाओं का पता लगाना है। यंग (Young) का कहना है कि साक्षात्कार को एक ऐसी क्रमबद्ध पद्धति माना जा सकता है, जिसके द्वारा साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता के आंतरिक जीवन में अधिक या कम काल्पनिक रूप से प्रवेश करता है। इससे उसे सूचनादाता की आंतरिक भावनाओं का काफी सीमा तक पता चल जाता है। वह उसके चेहरे पर आने वाले उतार-चढ़ाव को सरलता से देख सकता है और इस बात का अनुमान लगा सकता है कि सूचनादाता सही सूचना दे रहा है या नहीं।
  7. उपकल्पनाओं का निर्माण–साक्षात्कार का अंतिम उद्देश्य साक्षात्कारकर्ता को उपकल्पनाओं के निर्माण में सहायता प्रदान करना है। साक्षात्कार को उपकल्पनाओं को एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया है; क्योंकि इससे समस्या के विभिन्न पक्षों के बारे में यथेष्ट जानकारी प्राप्त होती है। यह जानकारी उपकल्पना के निर्माण का स्रोत होती है।

प्रश्न 11.
एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता के गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
किसी भी समस्या पर अनुसंधान करना इतना सरल नहीं है जितना कि यह ऊपर से प्रतीत होता है। वास्तव में, यह एक ऐसी कला है, जिसमें हर कोई व्यक्ति पारंगत नहीं हो सकता। इसके लिए कुशल अनुसंधानकर्ता अथवा साक्षात्कारकर्ता की आवश्यकता होती है। एक अच्छा अनुसंधानकर्ता ही अच्छी तरह से सूचनाएँ एकत्रित कर सकता है और सही निष्कर्ष निकाल सकता है।

एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता के गुण

सामाजिक अंवेषण में वास्तविक सूचनाएँ एकत्रित करना एक कठिन कार्य है। सफल अनुसंधानकर्ता अथवा साक्षात्कारकर्ता अपनी सूझ-बूझ के आधार पर इसे अधिक सरल बना देता है। एक अच्छे अनुसंधानकर्ता अथवा साक्षात्कारकर्ता में निम्नलिखित गुण होने अनिवार्य हैं

  1. उच्च व्यक्तित्व–एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता या अनुसंधानकर्ता का सबसे प्रथम गुण उसका अच्छा एवं उच्च व्यक्तित्व है। उसके व्यक्तित्व का इतना प्रभाव होना चाहिए कि सूचनादाता उसे सूचनाएँ देने के लिए तत्पर हो जाए।
  2. उन्मुक्त वार्तालाप की क्षमता साक्षात्कारकर्ता में उन्मुक्त वार्तालाप करने की क्षमता होनी चाहिए। साक्षात्कारकर्ता को चाहिए कि वह सूचनादाता को वार्तालाप करने की पूर्ण सुविधा दे। यदि साक्षात्कारकर्ता में समय-समय पर सूचनादाता को प्रोत्साहन देने की क्षमता हो तो वह सूचनादाता से पूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकता है।
  3. सत्यता की खोज की क्षमता-साक्षात्कारदाता अथवा सूचनादाता विविध प्रकार के व्यक्ति होते हैं, जो कई बार भावावेश में आकर बढ़-चढ़कर बातें बनाने लगते हैं या पक्षपातपूर्ण तथ्यों को प्रस्तुत करते हैं या कुछ तथ्यों को छिपाने का प्रयास करते हैं। इन परिस्थितियों में सही सूचना की प्राप्ति की संभावना अत्यधिक कम रहती है। ऐसी परिस्थितियों में एक सफल वे कुशल साक्षात्कारकर्ता में ऐसे गुणों का होना आवश्यक है, जिनके आधार पर वह दी गई सूचनाओं में से सत्यता का अंश निकाल सके तथा वह इस बात का अनुमान लगा सके कि सूचनादाता द्वारा दी गई सूचनाओं में सत्यता का अंश कितना है।।
  4. उच्च कोटि की मनोवैज्ञानिकता–-एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता में उच्च कोटि की मनोवैज्ञानिकता होना भी अनिवार्य है। यह मनोवैज्ञानिकता साक्षात्कारदाताओं के हृदय को पहचानने में तथा उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से उत्तर एवं सूचना देने के लिए तत्पर करने में तथा बीच-बीच में प्रेरणा देने में सहायता प्रदान करती है।
  5. सक्रिय सहयोग लेने की क्षमता–साक्षात्कारकर्ता में इतनी क्षमता एवं योग्यता का होना आवश्यक है कि वह सूचनादाताओं से अधिक-से-अधिक सहयोग ले सके। यदि साक्षात्कारदाता साक्षात्कारकर्ता से मिलकर कार्य नहीं करेगा या उसको सहयोग नहीं देगा तो साक्षत्कारकर्ता अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता।।
  6. निष्पक्षता तथा ईमानदारी–एक सफल साक्षात्कारकर्ता का एक अन्य विशिष्ट गुण निष्पक्षता तथा ईमानदारी है। एक साक्षात्कारकर्ता को निष्पक्ष भाव से सूचनादाताओं के पास जाना चाहिए और अपनी ईमानदारी व चरित्र की पवित्रता से साक्षात्कारदाताओं को सूचना देने के लिए राजी करना चाहिए।
  7. कुशलता एवं चतुराई–एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता का कुशल एवं चतुर होना भी अनिवार्य है। एक कुशल एवं चतुर साक्षात्कारकर्ता ही सूचनादाताओं, जो कि विविध प्रकार की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के होते हैं, से ठीक प्रकार से सूचना प्राप्त कर सकता है। उसमें परिस्थितियों के अनुरूप वे सभी सूचनाएँ लेने की क्षमता होनी चाहिए।

निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि साक्षात्कार करना एक कला है। इस कला में निपुण होने के लिए साक्षात्कारकर्ता को विविध प्रकार के गुणों से युक्त होना अनिवार्य है।

प्रश्न 12.
साक्षात्कार पद्धति के गुण एवं दोषों का वर्णन कीजिए।
या
तथ्यों के संकलन में साक्षात्कार पद्धति की महत्ता एवं सीमाओं को बताइए।
उत्तर
साक्षात्कार को सभी प्रकार के अनुसंधानों में मुख्य अथवा पूरक प्रविधि के रूप में अपनाया जाता है। यह इसके महत्त्व का द्योतक है परंतु सामग्री अथवा आँकड़े संकलन करने की अन्य पद्धतियों की भाँति साक्षात्कार के कुछ दोष भी हैं। इसके विभिन्न गुण-दोषों के आधार पर ही इसका मूल्यांकन किया जा सकता है।

साक्षात्कार का महत्त्व या गुण साक्षात्कार के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उपयोगी–इस पद्धति का सबसे बड़ा महत्त्व इसकी मनोवैज्ञानिक उपयोगिता है। इसमें व्यक्ति के मनोभावों का अध्ययन करने का अवसर प्राप्त होता है। साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता से समस्या से संबंधित सूचनाएँ ही प्राप्त नहीं करता अपितु वह साक्षात्कारदाता (उत्तरदाता या सूचनादाता) के मन के भावों को भी ‘पहचानने का प्रयास करता है और साथ ही उसके व्यवहार का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करता है। इसलिए इस प्रविधि को साक्षात्कारकर्ता द्वारा सूचनादाता, जो कि अपेक्षाकृत अपरिचित व्यक्ति है, के मन में प्रवेश करने की प्रविधि कहा गया है। अन्य किसी पद्धति द्वारा इस प्रकार का अध्ययन संभव नहीं है।
  2. अमूर्त घटनाओं का अध्ययन–साक्षात्कार प्रविधि के अंतर्गत मूर्त तथा अमूर्त दोनों प्रकार की घटनाओं का अध्ययन किया जा सकता है। समाज में व्यक्ति की भावनाओं तथा उसके संवेगों एवं मनोवृत्तियों का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये भावनाएँ एवं संवेग अमूर्त होते हैं। इनका अध्ययन करने के लिए साक्षात्कार प्रविधि के अतिरिक्त अन्य कोई प्रविधि उपयुक्त नहीं है, क्योंकि इस प्रविधि में साक्षात्कारकर्ता तथा साक्षात्कारदाता का प्रत्यक्ष संपर्क होता है, इसलिए दोनों एक-दूसरे के मनोभावों तथा संवेगों को जानने का प्रयास करते हैं। दोनों एक-दूसरे के व्यवहार को भी जानने का प्रयास करते हैं। साक्षात्कारकर्ता क्योंकि प्रशिक्षित होता है, इसलिए उत्तरदाता के मनोभावों तथा संवेगों का सरलता से अनुमान लगा सकता है।
  3. मर्मभेदी अध्ययन–समस्या से संबंधित अनेक पहलू अथवा घटनाएँ ऐसी हो सकती हैं, जो मर्मभेदी होने के कारण नहीं देखी जा सकतीं। सामान्यतया सूचनादाता के व्यक्तिगत जीवन से संबंधित अनेक बातों की जानकारी अवलोकन इत्यादि द्वारा प्राप्त नहीं हो सकती, अपितु ऐसे गोपनीय विषयों के बारे में सूचना प्राप्त करने की एकमात्र पद्धति साक्षात्कार ही है।
  4. भूतकालीन घटनाओं का अध्ययन–साक्षात्कार प्रविधि में भूतकालीन घटनाओं का अध्ययन करना भी संभव है। साक्षात्कारदाता के जीवन में बहुत-सी घटनाएँ घटित होती हैं, जिनकी पुनरावृत्ति भी संभव नहीं है। इन घटनाओं का अध्ययन करने के लिए साक्षात्कार प्रविधि ही सर्वोत्तम है। साक्षात्कारदाता साक्षात्कारकर्ता से अपनी भूतकालीन घटनाओं का वर्णन कर सकता है। इस प्रकार के वर्णन से वह साक्षात्कारकर्ता को भूतकालीन घटनाओं से परिचित कराता है। यदि साक्षात्कारदाता इस प्रकार की घटनाओं से साक्षात्कारकर्ता को परिचित न कराए तो उन घटनाओं का अध्ययन करना ही अंसभव हो जाए; क्योंकि उन घटनाओं का अन्य किसी व्यक्ति को पता नहीं होता है और उनके पुनः घटित होने की संभावना भी बहुत कम होती है।
  5. विस्तृत सूचनाओं की प्राप्ति–साक्षात्कार प्रविधि में व्यक्तियों से विस्तृत सूचनाएँ एकत्रित की जा सकती हैं, चाहे वे समाज के किसी भी वर्ग से संबंधित क्यों न हों। इसलिए इस प्रकार का अध्ययन शिक्षित, अशिक्षित, ग्रामीण, नगरीय सभी स्तर के लोगों में किया जा सकता है। साक्षात्कार प्रविधि विस्तृत सूचनाओं की प्राप्ति की सबसे सरल मार्ग है, क्योंकि जो सूचनादाता प्रश्नों को नहीं समझते, अनुसंधानकर्ता उन प्रश्नों को उन्हें समझाकर उनके उत्तर प्राप्त कर लेता है।
  6. सभी स्तर के व्यक्तियों का अध्ययन–विस्तृत सूचनाओं की प्राप्ति के साथ-साथ साक्षात्कार * सभी प्रकार के सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने की एक प्रमुख प्रविधि है। क्योंकि इसमें साक्षात्कारकर्ता को ही साक्षात्कार से प्राप्त सूचनाएँ अंकित करनी होती हैं, इसलिए सूचनादाताओं को पढ़ा-लिखा होना अनिवार्य नहीं है। यह प्रविधि वास्तव में सभी स्तर के तथा सभी प्रकार की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों से सूचना संकलित करने में अत्यंत उपयोगी है।
  7. विचारों के आदान-प्रदान की सुविधा-साक्षात्कार प्रविधि में साक्षात्कारकर्ता तथा साक्षात्कारदाता के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता है। सूचनाओं की प्राप्ति में जो भी विलंब यो शंका होती है, उसका समाधान साथ-ही-साथ हो जाता है। विचारों के आदान-प्रदान से इस प्रकार के संत्य सामने आ जाते हैं, जिनका परिचय अन्य किसी प्रविधि से नहीं हो सकता है। इस प्रकार साक्षात्कार प्रविधि में द्वंद्ववाद के माध्यम से साक्षात्कारदाता तथा साक्षात्कारकर्ता एक-दूसरे के विचारों से अवगत होते हैं और विचार-विमर्श करके किसी एक निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं।
  8. सूचनाओं की विश्वसनीयता-साक्षात्कार प्रविधि में साक्षात्कारदाता से जो सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं उनकी विश्वसनीयता की परीक्षा भी की जा सकती है। इन सूचनाओं की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कारदाता से विभिन्न के अन्वेषक प्रश्न पूछता है और उनके उत्तरों से पूर्व दिए गए उत्तरों की जाँच कर लेता है। साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कारदाता के मन के भाव को पहचानकर सूचनाओं की सत्यता की परीक्षा कर सकता है। साथ ही वह साक्षात्कार के समय थोड़ा-बहुत अवलोकन करके सूचनाओं की विश्वसनीयता को परख लेता है।
  9. पारस्परिक प्रेरणा—नए तथ्यों की प्राप्ति के लिए पारस्परिक प्रेरणा का तत्त्व महत्त्वपूर्ण होता है। साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता के सामने होता है, इसलिए वह निरंतर सूचनादाता को वार्तालाप की प्रेरणा देकर विषय से संबंधित सूचनाएँ प्राप्त करता है। सूचनादाता भी साक्ष्ज्ञात्कारकर्ता को अनेक ऐसे पहलुओं की जानकारी देता है, जिनके बारे में हो सकता है कि वह पहले से न जानता हो। अतः यह पारस्परिक प्रेरणा पर आधारित होने के कारण एक अत्यंत उपयोग प्रविधि है।

साक्षात्कार की सीमाएँ या दोष

सामाजिक अनुसंधान में साक्षात्कार पद्धति अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हुए भी पूर्णतया दोषमुक्त नहीं है। इसकी कुछ अपनी ही सीमाएँ हैं, जो निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत स्पष्ट की जा सकती हैं-

  1. दोषपूर्ण स्मरण-शक्ति–साक्षात्कार पद्धति में सामान्यतः साक्षात्कार के परिणामों को घटनास्थल पर ही नहीं लिखा जाता। यदि अनौपचारिक व गहन अध्ययन के उद्देश्य से साक्षात्कार किया जा रहा है तो वार्तालाप को उसी समय नहीं लिखा जाता। जब साक्षात्कारकर्ता बाद में इन्हें लिखने बैठता है तो हो सकता है कि दोषपूर्ण स्मरण-शक्ति के कारण वह महत्त्वपूर्ण तथ्यों को लिखना ही भूल जाए।
  2. अप्रमाणित सूचनाएँ—यदि साक्षात्कारदाता गलत सूचनाएँ देता है तो उन्हें प्रमाणित करने का कोई उपाय नहीं है। कई बार साक्षात्कारकर्ता भी सूचनादाता के साथ पक्षपात करने के कारण उसके द्वारा दी गई सूचनाओं को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करता है।
  3. अवैज्ञानिक पद्धति–साक्षात्कार को ‘अनेक विद्वान वैज्ञानिक पद्धति स्वीकार नहीं करते हैं। एक तो इसमें अमूर्त तत्त्वों; जैसे सूचनादाता के संवेगों व भावनाओं का विश्लेषण किया जाता है। जो कि वैज्ञानिक नहीं हो सकता। दूसरे, साक्षात्कार करने तथा प्रतिवेदन तैयार करने में होने वाली देरी भी इसे अवैज्ञानिक बना देती है; क्योंकि कई बार महत्त्वपूर्ण तथ्य छूट जाते हैं। तीसरे, इसमें सूचनादाता की इधर-उधर की बातें ज्चादा सुननी पड़ती हैं।
  4. कुशल साक्षात्कारकर्ताओं का अभाव–साक्षात्कार पद्धति का एक अन्य दोष कुशल साक्षात्कारकर्ताओं का अभाव है। एक तो अच्छे व प्रशिक्षित साक्षात्कारकर्ता मिलते ही नहीं हैं। और दूसरे यदि उन्हें प्रशिक्षण देकर कुशल बनाया भी जाता है तो वे बची में ही अपना काम छोड़कर चले जाते हैं। इससे एकत्रित सूचनाओं की विश्वसनीयता कम हो जाती है।
  5. साक्षात्कारदाता की हीनता-कई बार साक्षात्कारकर्ता का व्यक्तित्व सूचनादाताओं पर इस प्रकार का प्रभाव छोड़ता है कि उनमें हीनता की भावना आ जाती है। इस हीनता की भावना के कारण वे बहुत-सी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। इससे सूचनाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
  6. सामाजिक स्थिति में अंतर–सामाजिक अनुसंधान में साक्षात्कारकर्ता तथा साक्षात्कारदाता की सामाजिक स्थिति में यदि समानता है तो उत्तर ही सरलता से प्राप्त नहीं हो जाते, अपितु वे अधिक विश्वसनीय भी होते हैं। परंतु अधिकतर साक्षात्कारकर्ता और साक्षात्कारदाता की सामाजिक स्थिति में अत्यधिक अंतर पाया जाता है, इसके कारण उपयुक्त स्तर पर वार्तालाप करने में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ पैदा हो जाती हैं।
  7. महत्त्वपूर्ण अनुभवों की उपेक्षा–साक्षात्कार द्वारा अध्ययन करने में अनुसंधानकर्ता को सूचनादाताओं पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वे कई बार महत्त्वपूर्ण पक्षों पर सूचना ही नहीं देते और कई बार साक्षात्कारकर्ता ही प्रशिक्षित व अनुभवी न होने के कारण महत्त्वपूर्ण तथ्यों की उपेक्षा कर देता है। इससे निष्कर्ष प्रभावित होते हैं।
  8. अधिक समय-साक्षात्कार पद्धति में साक्षात्कारकर्ता को प्रत्येक सूचनादाता से प्रत्यक्ष एवं व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करना पड़ता है। अनेक बार एक सूचनादाता के पास जाने के बाद वह साक्षात्कार के लिए राजी हो पाता है। कई बार तो निर्धारित समय पर वह मिलता ही नहीं है। इस सारी प्रक्रिया में अनुसंधानकर्ता का अत्यधिक समय बरबाद हो जाता है।
  9. अधिक खर्चीली-अत्यधिक समय के साथ-साथ साक्षात्कार पद्धति अधिक खर्चीली भी है, क्योंकि प्रत्येक सूचनादाता से सम्पर्क स्थापित करने के लिए बार-बार जाने में पैसा भी काफी खर्च हो जाता है। निदर्शन के लिए जिस स्रोत का प्रयोग किया गया है, उसमें लिखे पते भी कई बार बदल गए होते हैं; अर्थात् कई सूचनादाता अपना निवास बदल लेते हैं, जिससे उनके साथ संपर्क स्थापित करने में काफी पैसा लग जाता है।
  10. सूचनादाता द्वारा अनुपयोगी भाषण–साक्षात्कार पद्धति में अनुसंधानकर्ता पूरी तरह से सूचनादाताओं पर निर्भर रहता है। कई सूचनादाता अनुपयोगी भाषण अधिक देते हैं और काम की बात कम करते हैं।

निष्कर्ष–उपर्युक्त दोषों का अर्थ यह कदापि नहीं है कि साक्षात्कार एक अनुपयोगी पद्धति है। यदि अनुसंधानकर्ता प्रशिक्षित व कुशल है, सूचनादाता से ठीक प्रकार से संपर्क स्थापित करता है तो इसके अनेक दोष स्वत: ही दूर हो जाते हैं। साक्षात्कार आज तक अत्यंत उपयोगी पद्धति मानी जाती रही है।

प्रश्न 13.
क्षेत्रीय कार्य किसे कहते हैं? समाजशास्त्र में क्षेत्रीय कार्य का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
क्षेत्रीय कार्य को एक कठोर वैज्ञानिक पद्धति के रूप में स्वीकार किया जाता है। समाजशास्त्र तथा सामाजिक मानवशास्त्र में आज क्षेत्रीय कार्य पर आधारित अध्ययनों को प्राथमिकता दी जाने लगी है। पहले मानवशास्त्र में जो अध्ययन किए जाते थे वे क्षेत्रीय कार्य पर आधारित न होकर पुस्तकालय में उपलब्ध द्वितीयक स्रातों पर आधारित होते थे। इन स्रोतों के आधार पर किए गए अध्ययनों को पुस्तकीय दृष्टिकोण द्वारा किए गए अध्ययन कहा जाता है। अध्ययन का यह दृष्टिकोण आदर्शात्मक दृष्टिकोण, दर्शनशास्त्रीय दृष्टिकोण या भारतीय विद्याशास्त्रीय दृष्टिकोण भी कहा जाता है। क्षेत्रीय कार्य के आधार पर किए गए अध्ययनों को क्षेत्राधारित दृष्टिकोण द्वारा किए गए अध्ययन कहते हैं।

क्षेत्रीय कार्य का अर्थ

क्षेत्रीय कार्य अध्ययन की वह पद्धति है जो समाज की वर्तमान यथार्थता को क्षेत्र में जाकर समझने पर महत्त्व देती है। उदाहरणार्थ-यदि भारतीय समाज को समझने हेतु क्षेत्रीय वास्तविकता को आधार माना जाता है अर्थात् जिस प्रकार का समाज विद्यमान है उसका उसी यथार्थ रूप में चित्रण करने का प्रयास किया जाता है तो यह चित्रण क्षेत्रीय कार्य पर होगा। क्षेत्रीय कार्य में आनुभविक अनुसंधान पर आधारित अध्ययनों की महत्ता को स्वीकार किया जाता है। इसमें आनुभविक या प्रयोगसिद्ध अनुसंधान के आधार पर जो क्षेत्रीय आँकड़े संकलित किए जाते हैं जिन्हें प्राथमिक आँकड़े भी कहा जाता है। प्राथमिक आँकड़े वे सूचनाएँ होती हैं, जिन्हें अनुसंधानकर्ता प्रयोग में लाने के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित करता है। ये आँकड़े मौलिक होते हैं। प्राथमिक आँकड़े अनुसंधानकर्ता द्वारा स्वयं अनुसंधान क्षेत्र में जाकर एकत्रित किए जाते हैं। अध्ययनकर्ता इस प्रकार के आँकड़ों का संकलन सहभागी एवं असहभागी अवलोकन, साक्षात्कार, अनुसूची तथा प्रश्नावली इत्यादि के माध्यम से करता है। प्राथमिक आँकड़े अधिक प्रमाणित एवं विश्वसनीय माने जाते हैं।

समाजशास्त्र में क्षेत्रीय कार्य का महत्त्व

समाजशास्त्र एवं सामाजिक मानवशास्त्र में बहुत-से समुदाय या भौगोलिक स्थान क्षेत्रीय कार्य के प्रतिष्ठित उदाहरणों से संबंधित होने के कारण इन विषयों में काफी लोकप्रिय बन गए हैं। क्षेत्रीय कार्य में सामान्यत: अनुसंधानकर्ता अध्ययनरत् समुदाय में रह रहे सभी लोगों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करता है। क्षेत्रीय कार्य की पद्धति को प्रतिस्थापित करने का श्रेय मैलिनोव्स्की को दिया जाता है जिन्होंने प्रथम युद्ध के समय ऑस्ट्रेलिया की जनजातियों तथा दक्षिणी प्रशांत के द्वीपों (मुख्य रूप से ट्रोबियाण्ड द्वीपों) के मूल निवासियों का अध्ययन किया। इसके पश्चात् रैडक्लिफ-ब्राउन ने अंडमान व निकाबोर द्वीपों का अध्ययन किया। ईवान्स प्रिचार्ड द्वारा सूडान में न्यूर, फ्रांज बोआस द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका में विभिन्न मूल अमेरिकन जनजातियों, मारग्रेट मीड द्वारा समोआ तथा क्लीफोर्ड गीट्स द्वारा बाली में किए गए अध्ययन भी क्षेत्रीय कार्य के आधार पर किए गए अध्ययनों में प्रमुख माने जाते हैं। विलियम वाइजर, ऑस्कर लेविस जैसे विदेशी विद्वानों तथा एम०एन० श्रीनिवास एवं एस०सी० दुबे इत्यादि भारतीय समाजशास्त्रियों द्वारा भी गाँव के क्षेत्रीय कार्य पद्धति द्वारा अध्ययन किए गए हैं। इन अध्ययनों तथा मानवशास्त्री अध्ययनों में मूल अंतर यह है कि समाजशास्त्री अध्ययनों में असहभागी अवलोकन पद्धति अथवा अर्द्ध-सहभागी अवलोकन पद्धति को अपनाया गया है, जबकि मानवशास्त्री अध्ययनों में सहभागी अवलोकन की पद्धति को। समाजशास्त्र में क्षेत्रीय कार्य पर आधारित अध्ययन गाँव को समझने तथा उनको यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने में काफी सहायक रहे हैं।

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