UP Board Solutions for Class 10 Hindi विविध विषयाधारित निबन्ध

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विविध विषयाधारित निबन्ध

51. व्यायाम और स्वास्थ्य [2015]

सम्बद्ध शीर्षक

  • व्यायाम से लाभ [2009]
  • विद्यार्थी जीवन में खेलकूद का महत्त्व [2011]
  • स्वास्थ्य रक्षा
  • स्वस्थ शरीर में स्वस्थ बुद्धि का निवास
  • खेल और व्यायाम
  • स्वास्थ्य शिक्षा का महत्त्व [2012, 13, 16]
  • विद्यालयों में स्वास्थ्य-शिक्षा [2014]
  • व्यायाम का महत्त्व [2016]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. व्यायाम का अर्थ,
  3. व्यायाम के रूप,
  4. व्यायाम की मात्रा,
  5. व्यायाम के लिए आवश्यक बातें,
  6. व्यायाम से लाभ,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना-मनव-जीवन में स्वास्थ्य का अत्यधिक महत्त्व है। यदि मनुष्य का शरीर स्वस्थ है तो वह जीवन में अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर सकता है। यह मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ पूँजी है। एक तन्दुरुस्ती हजार नियामत’ के अनुसार, स्वास्थ्य वह सम्पदा है जिसके द्वारा मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर सकता है-‘धर्मार्थ-काम-मोक्षाणाम्, आरोग्यं मूलकारणम्।’ अंग्रेजी में भी कहावत है-‘Health is wealth.’; अर्थात् स्वास्थ्य ही धन है। प्राचीन काल से ही स्वास्थ्य की महत्ता पर बल दिया जाता रहा है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन, चिन्तामुक्त जीवन, उचित विश्राम और पर्याप्त व्यायाम की आवश्यकता होती है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए व्यायाम सर्वोत्तम साधन है।

व्यायाम का अर्थ मन को प्रफुल्लित रखने एवं तन को सशक्त एवं स्फूर्तिमय बनाने के लिए हम कुछ नियमों के अनुसार जो शारीरिक गति करते हैं, उसे ही व्यायाम कहते हैं। केवल दण्ड-बैठक, कुश्ती, आसन आदि ही व्यायाम नहीं हैं, वरन् शरीर के अंग-प्रत्यंग का संचालन भी, जिससे स्वास्थ्य की वृद्धि होती है, व्यायाम कहा जाता है।

व्यायाम के रूप-मन की शक्ति के विकास के लिए चिन्तन-मनन करना आदि मानसिक व्यायाम कहे जाते हैं। शारीरिक बल व स्फूर्ति बढ़ाने को शारीरिक व्यायाम कहा जाता है। प्रधान रूप से व्यायाम शरीर को पुष्ट करने के लिए किया जाता है।

शारीरिक व्यायाम को दो वर्गों में रखा गया है–

  1. खेल-कूद तथा
  2. नियमित व्यायाम।

खेल-कूद में रस्साकशी, कूदना, दौड़ना, कबड्डी, तैरना आदि व्यायाम आते हैं। इनके करने से रक्त का तेजी से संचार होता है और प्राण-वायु की वृद्धि होती है। आधुनिक खेलों में हॉकी, फुटबाल, वॉलीबाल, क्रिकेट आदि खेल व्यायाम के रूप हैं। खेल-कूद सभी स्थानों पर सभी लोग सुविधापूर्वक नहीं कर पाते, इसलिए वे शरीर को पुष्ट रखने के लिए कुश्ती, मुग्दर घुमाना, योगासन आदि अन्य नियमित व्यायाम करते हैं। व्यायाम केवल पुरुषों के लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु स्त्रियों को भी व्यायाम करना चाहिए। रस्सी कूदना, नृत्य करना आदि स्त्रियों के लिए परम उपयोगी व्यायाम हैं।

व्यायाम की मात्रा–व्यायाम कितना किया जाये, यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। बालक, युवा, स्त्री, वृद्ध आदि के लिए व्यायाम की अलग-अलग मात्रा है। कुछ के लिए हल्के व्यायाम, कुछ के लिए प्रातः भ्रमण तथा कुछ के लिए अन्य प्रकार के खेल व्यायाम का कार्य करते हैं। आयु, शक्ति, लिंग एवं स्थान के भेद से व्यायाम की मात्रा में अन्तर हो जाता है।

व्यायाम के लिए आवश्यक बातें–व्यायाम का उचित समय प्रात:काल है। प्रातः शौच आदि से निवृत्त होकर बिना कुछ खाये, शरीर पर तेल लगाकरे व्यायाम करना चाहिए। व्यायाम शुद्ध वायु में लाभकारी होता है। व्यायाम प्रत्येक अंग का होना चाहिए। व्यायाम का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। व्यायाम के विभिन्न रूप प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक अवस्था में लाभदायक नहीं हो सकते; अतः उपयुक्त समय में उचित मात्रा में अपने लिए उपयुक्त व्यायाम का चुनाव करना चाहिए। व्यायाम करते समय नाक से साँस लेना चाहिए और व्यायाम के बाद कुछ देर रुककर स्नान करना चाहिए। व्यायाम करने के बाद दूध आदि पौष्टिक पदार्थों का सेवन आवश्यकता व सामर्थ्य के अनुसार अवश्य करना चाहिए।

व्यायाम से लाभ-व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि और तेज बढ़ता है, अंग-प्रत्यंग में उष्ण रक्त प्रवाहित होने से स्फूर्ति आती है, मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं, पाचन-शक्ति ठीक रहती है तथा शरीर स्वस्थ और हल्का प्रतीत होता है। व्यायाम के साथ मनोरंजन का समावेश होने से लाभ द्विगुणित होता है। इससे मन प्रफुल्लित रहता है और व्यायाम की थकावट भी अनुभव नहीं होती। शरीर स्वस्थ होने से सभी , इन्द्रियाँ सुचारु रूप से काम करती हैं। व्यायाम से शरीर नीरोग, मन प्रसन्न और जीवन सरस हो जाता है।

शरीर और मन के स्वस्थ रहने से बुद्धि भी ठीक कार्य करती है। अंग्रेजी में कहावत है—’Sound mind exists in a sound body’; अर्थात् स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। मन प्रसन्न और बुद्धि सक्रिय रहने से मनुष्य की कार्यक्षमता बढ़ जाती है। वह परिश्रमी और स्वावलम्बी हो जाता है।

व्यायाम करने से अनेक लाभ होते हैं, परन्तु इसमें असावधानी करने के कारण हानियाँ भी हो सकती हैं। व्यायाम का चुनाव करते समय, आयु एवं शारीरिक शक्ति का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। उचित समय पर, उचित मात्रा में और उपयुक्त व्यायाम न करने से लाभ के बजाय हानि होती है। व्यायाम करने वालों के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना अधिक लाभकारी होता है।

उपसंहार-आज के इस मशीनी युग में व्यायाम की उपयोगिता अत्यधिक बढ़ गयी है; क्योंकि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मशीनों का आधिपत्य हो गया है। दिन-भर कार्यालय में कुर्सी पर बैठकर कलम घिसना अब गौरव की बात समझी जाती है तथा शारीरिक श्रम को तिरस्कार और उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है।
जर्जर कर दिया है। अत: आज देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सुन्दर शरीर, निर्मल मन तथा विवेकपूर्ण बुद्धि के लिए उपयुक्त व्यायाम नियमित रूप से प्रतिदिन करता रहे।

52. योग शिक्षा : आवश्यकता और उपयोगिता [2016, 17]

सम्बद्ध शीर्षक

  • मानव-जीवन में योग शिक्षा का महत्त्व [2011]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. योग का अर्थ,
  3. योग की आवश्यकता,
  4. योग की उपयोगिता,
  5. योग के सामान्य नियम
  6. योग से लाभ,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना-योगासन शरीर और मन को स्वस्थ रखने की प्राचीन भारतीय प्रणाली है। शरीर को किसी ऐसे आसन या स्थिति में रखना जिससे स्थिरता और सुख का अनुभव हो, योगासन कहलाता है।
अंग में शुद्ध वायु का संचार होता है जिससे उनमें स्फूर्ति आती है। परिणामत: व्यक्ति में उत्साह और कार्य-क्षमता का विकास होता है तथा एकाग्रता आती है।

योग का अर्थ-योग, संस्कृत के यज् धातु से बना है, जिसका अर्थ है, संचालित करना, सम्बद्ध करना, सम्मिलित करना अथवा जोड़ना। अर्थ के अनुसार विवेचन किया जाए तो शरीर एवं आत्मा का मिलन ही योग कहलाता है। यह भारत के छ: दर्शनों, जिन्हें षड्दर्शन कहा जाता है, में से एक है। अन्य दर्शन हैं-न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त एवं मीमांसा। इसकी उत्पत्ति भारत में लगभग 5000 ई०पू० में हुई थी। पहले यह विद्या गुरु-शिष्य परम्परा के तहत पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी को हस्तांतरित होती थी। लगभग 200 ई०पू० में महर्षि पतञ्जलि ने योग-दर्शन को योग-सूत्र नामक ग्रन्थ के रूप में लिखित रूप में प्रस्तुत किया। इसलिए महर्षि पतञ्जलि को ‘योग का प्रणेता’ कहा जाता है। आज बाबा रामदेव ‘योग’ नामक इस अचूक विद्या का देश-विदेश में प्रचार कर रहे हैं।

योग की आवश्यकता–शरीर के स्वस्थ रहने पर ही मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। मस्तिष्क से ही शरीर की समस्त क्रियाओं का संचालन होता है। इसके स्वस्थ और तनावमुक्त होने पर ही शरीर की सारी क्रियाएँ भली प्रकार से सम्पन्न होती हैं। इस प्रकार हमारे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास के लिए योगासन अति आवश्यक है।

हमारा हृदय निरन्तर कार्य करता है। हमारे थककर आराम करने या रात को सोने के समय भी हृदय गतिशील रहता है। हृदय प्रतिदिन लगभग 8000 लीटर रक्त को पम्प करता है। उसकी यह क्रिया जीवन भर चलती रहती है। यदि हमारी रक्त-नलिकाएँ साफ होंगी तो हृदय को अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। इससे हृदय स्वस्थ रहेगा और शरीर के अन्य भागों को शुद्ध रक्त मिल पाएगा, जिससे नीरोग व सबल हो जाएँगे। फलत: व्यक्ति की कार्य-क्षमता भी बढ़ जाएगी।

योग की उपयोगिता-मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे जीवन में योग अत्यन्त उपयोगी है। शरीर, मन एवं आत्मा के बीच सन्तुलन अर्थात् योग स्थापित करना होता है। योग की प्रक्रियाओं में जब तन, मन और आत्मा के बीच सन्तुलन एवं योग (जुड़ाव) स्थापित होता है, तब आत्मिक सन्तुष्टि, शान्ति एवं चेतना का अनुभव होता है। योग शरीर को शक्तिशाली एवं लचीला बनाए रखता है, साथ ही तनाव से भी छुटकारा दिलाता है। यह शरीर के जोड़ों एवं मांसपेशियों में लचीलापन लाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, शारीरिक विकृतियों को काफी हद तक ठीक करता है, शरीर में रक्त प्रवाह को सुचारु करता है तथा पाचन-तन्त्र को मजबूत बनाता है। इन सबके अतिरिक्त यह शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्तियाँ बढ़ाता है, कई प्रकार की बीमारियों जैसे अनिद्रा, तनाव, थकान, उच्च रक्तचाप, चिन्ता इत्यादि को दूर करता है तथा शरीर को ऊर्जावान बनाता है। आज की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में स्वस्थ रह पाना किसी चुनौती से कम नहीं है। अत: हर आयु-वर्ग के स्त्री-पुरुष के लिए योग उपयोगी है।

योग के सामान्य नियम-योगासन उचित विधि से ही करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि की सम्भावना रहती है। योगासन के अभ्यास से पूर्व उसके औचित्य पर भी विचार कर लेना चाहिए। बुखार से ग्रस्त तथा गम्भीर रोगियों को योगासन नहीं करना चाहिए। योगासन करने से पहले नीचे दिए सामान्य नियमों की जानकारी होनी आवश्यक है

  1.  प्रातः काल शौचादि से निवृत्त होकर ही योगासन का अभ्यास करना चाहिए। स्नान के बाद योगासन करना और भी उत्तम रहता है।
  2. सायंकाल खाली पेट पर ही योगासन करना चाहिए।
  3. योगासन के लिए शान्त, स्वच्छ तथा खुले स्थान का चयन करना चाहिए। बगीचे अथवा पार्क में योगासन करना अधिक अच्छा रहता है।
  4. आसन करते समय कम, हलके तथा ढीले–ढाले वस्त्र पहनने चाहिए।
  5. योगासन करते समय मन को प्रसन्न, एकाग्र और स्थिर रखना चाहिए। कोई बातचीत नहीं करनी चाहिए।
  6. योगासन के अभ्यास को धीरे-धीरे ही बढ़ाएँ।
  7. योगासन का अभ्यास करने वाले व्यक्ति को हलका, शीघ्र पाचक, सात्विक और पौष्टिक भोजन करना चाहिए।
  8. अभ्यास के आरम्भ में सरल योगासन करने चाहिए।
  9. योगासन के अन्त में शिथिलासन अथवा शवासन करना चाहिए। इससे शरीर को विश्राम मिल जाता है तथा मन शान्त हो जाता है।
  10. योगासन करने के बाद आधे घण्टे तक न तो स्नान करना चाहिए और न ही कुछ खाना चाहिए।

योग से लाभ–छात्रों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिए योग विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध होता है, क्योंकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ाता है जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है।

पतञ्जलि के योग–सूत्र के अनुसार आसनों की संख्या 84 है। जिनमें भुजंगासन, कोणासन, पद्मासन, मयूरासन, शलभासन, धनुरासन, गोमुखासन, सिंहासन, वज्रासन, स्वस्तिकासन, पवर्तासन, शवासन, हलासन, शीर्षासन, धनुरासन, ताड़ासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, चतुष्कोणासन, त्रिकोणासन, मत्स्यासन, गरुड़ासन इत्यादि कुछ प्रसिद्ध आसन हैं। योग के द्वारा शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि और तेज बढ़ता है, अंग-प्रत्यंग में उष्ण रक्त प्रवाहित होने से स्फूर्ति आती है, मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं, पाचन-शक्ति ठीक रहती है तथा शरीर स्वस्थ और हल्का प्रतीत होता है। योग के साथ मनोरंजन का समावेश होने से लाभ द्विगुणित होता है। इससे मन प्रफुल्लित रहता है और योग की थकावट भी अनुभव नहीं होती। शरीर स्वस्थ होने से सभी इन्द्रियाँ सुचारु रूप से काम करती हैं। योग से शरीर नीरोग, मन प्रसन्न और जीवन सरस हो जाता है।

उपसंहार–आज की आवश्यकता को देखते हुए योग शिक्षा की बेहद आवश्यकता है, क्योंकि सबसे बड़ा सुख शरीर का स्वस्थ होना है। यदि आपका शरीर स्वस्थ है तो आपके पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है। स्वस्थ व्यक्ति ही देश और समाज का हित कर सकता है। अत: आज की भाग-दौड़ की जिन्दगी में खुद को स्वस्थ एवं ऊर्जावान बनाए रखने के लिए योग बेहद आवश्यक है। वर्तमान परिवेश में योग न सिर्फ हमारे लिए लाभकारी है, बल्कि विश्व के बढ़ते प्रदूषण एवं मानवीय व्यस्तताओं से उपजी समस्याओं के निवारण के सदर्भ में इसकी सार्थकता और बढ़ गई है।

53. देशाटन

सम्बद्ध शीर्षक

  • देशाटन से लाभ [2010, 11, 12, 13, 16]
  • पर्यटन (देशाटन) का महत्त्व [2013]
  • पर्यटन से होने वाले लाभ एवं हानि [2011]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. देशाटन का अर्थ,
  3. देशाटन के साधनों का विकास,
  4. देशाटन : एक स्वाभाविक प्रवृत्ति,
  5. देशाटन को महत्त्व,
  6. देशाटन से लाभ,
  7. देशाटन से हानियाँ,
  8. उपसंहार।

प्रस्तावना–परिवर्तन प्रकृति का नियम है। मानव का मन भी परिवर्तन चाहता है। जब मनुष्य एक स्थान पर रहता-रहता ऊब जाता है, तब उसकी इच्छा भ्रमण करने की होती है। भ्रमण का जीवन में बहुत महत्त्व है। भ्रमण से पारस्परिक सम्पर्क बढ़ता है, जिससे सद्भाव और मैत्री उत्पन्न होती है। यह ज्ञान-वृद्धि, मनोरंजन, स्वास्थ्य, व्यापार और विश्व-बन्धुत्व की दृष्टि से बहुत उपयोगी है।

देशाटन का अर्थ-‘देशाटन’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘देश’ + ‘अटन’। इसमें देश का अर्थ है–स्थान और ‘अटन’ का अर्थ है-भ्रमण। इस प्रकार देश-विदेश के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करना ‘देशाटन’ कहलाता है। जीवन का वास्तविक आनन्द भ्रमण करने में ही निहित है। भ्रमण करने से मनुष्य का ज्ञान और अनुभव भी बढ़ता है। वैसे विज्ञान के आविष्कारों और पुस्तकों के माध्यम से देश-विदेश की बातें ज्ञात हो जाती हैं, लेकिन सच्चा आनन्द और वास्तविक सुख तो प्रत्यक्ष देखने से ही मिलता है।

देशाटन के साधनों का विकास–मानव प्राचीन काल से ही पर्यटन-प्रेमी रहा है। सभ्यता के विकास के मूल में उसकी पर्यटन-प्रियता छिपी है। मनुष्य कभी तीर्थयात्रा के बहाने, कभी व्यापार के लिए तो कभी ज्ञानार्जन के लिए विदेशों की यात्रा पर निकल पड़ता था। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि भारतीय विदेशों में गये और विदेशी यात्री भारत आये। विदेशी यात्रियों में ह्वेनसांग, फाह्यान, वास्कोडिगामा आदि के नाम उल्लेखनीय रहे हैं। पहले पर्यटन के सुगम साधन उपलब्ध नहीं थे, परन्तु आजकल विज्ञान की उन्नति से देशाटन के विभिन्न साधनों का विकास हो गया है, जिससे मानव थोड़े ही समय में सुदूर देशों की सुविधापूर्वक यात्रा कर सकता है। आज पर्यटन के शौकीन लोगों के लिए दूरस्थ तीर्थस्थलों, ऐतिहासिक इमारतों, गर्जन करते हुए समुद्रों और कल-कल करती हुई नदियों तक पहुँच बनाना यातायात के साधनों के माध्यम से अत्यधिक सरल हो गया है।

देशाटन : एक स्वाभाविक प्रवृत्ति-वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति थोड़ा-बहुत घूमना व देश-विदेश का भ्रमण करना चाहता है, परन्तु कुछ लोगों को देशाटन का विशेष शौक होता है। वे साधनों की परवाह न करके उत्साहपूर्वक भ्रमण करते हैं। घुमक्कड़ों का विचार है कि पैदल देशाटन करने में जो आनन्द प्राप्त होता है, वह किसी वाहन से पर्यटन करने में प्राप्त नहीं होता। परिणामस्वरूप आजकल भी लोग पैदल या साइकिल से देश-भ्रमण के लिए निकलते हैं। देशाटन के कारण मनुष्य की जिज्ञासा, खोज-प्रवृत्ति, मनोरंजन एवं अनुभववृत्ति की पूर्ति होती है।

देशाटन का महत्त्व-मनुष्य के जीवन में विभिन्न देशों के भ्रमण का बड़ा महत्त्व है। घूमना-फिरना। मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। देश-विदेश में घूमकर मनुष्य अपनी जानकारी बढ़ाता है और मनोविनोद करता है। नये-नये स्थान और वस्तुएँ देखने से उसकी कौतूहल-वृत्ति शान्त होती है तथा उसका पर्याप्त मनोरंजन भी होता है। भ्रमण करने से भौगोलिक, ऐतिहासिक, पुरातत्त्व सम्बन्धी, सामाजिक और राजनीतिक ज्ञान तथा अनुभव में वृद्धि होती है।

देशाटन से लाभ-देशाटन के अनेक लाभ हैं, जो निम्नवत् हैं।
(अ) प्रकृति का सान्निध्य-सर्वप्रथम मनुष्य को प्रकृति से निकटता प्राप्त होती है। प्राकृतिक दृश्यों को देखने से हृदय आनन्दित और शरीर स्वस्थ हो जाता है। उन्मुक्त पशु-पक्षियों की भाँति जीवन आनन्दमय प्रतीत होने लगता है। प्रकृति के सान्निध्य से सादगी एवं सद्गुणों का विकास भी होता है।
(ब) ज्ञान-वृद्धि-पर्यटन से ज्ञान-वृद्धि में सहायता मिलती है। किसी वस्तु का विस्तृत एवं यथार्थ ज्ञान भ्रमण से ही प्राप्त होता है। अजन्ता की गुफाओं, ताजमहल, कुतुबमीनार और ऐतिहासिक चित्तौड़ दुर्ग को देखकर व उन स्थानों से सम्बन्धित तथ्यों और गौरव-गाथाओं को सुनकर जितनी जानकारी होती है, उतनी पुस्तकों को पढ़ने या सुनने से नहीं हो सकती।
(स) मनोरंजन–मनोरंजन का सर्वाधिक उत्तम साधन पर्यटन है। भ्रमण करने से विविध प्रकार की वस्तुएँ देखने को मिलती हैं। हिमाच्छादित पर्वतमालाओं, कल-कल नाद करती हुई नदियों की धाराओं, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थानों को देखने से मन का अवसाद दूर हो जाता है।
(द) विश्व-बन्धुत्व की भावना-देशाटन करने से मैत्रीभाव की वृद्धि होती है। देश-विदेश में भ्रमण करने से लोगों का सम्पर्क बढ़ता है, भाईचारे की भावना बढ़ती है तथा राष्ट्रीय एकता में वृद्धि होती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, अर्थात् सारी वसुधा हमारा कुटुम्ब है, इस विराट भावे की अनुभूति होती है।
(य) व्यापार में वृद्धि–एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण करने से वहाँ की कृषि-उपज, खनिज सम्पदा, कलाकृतियों आदि की विशेष जानकारी मिलती है, जिससे व्यापारी लोग व्यापार की सम्भावनाओं का पता लगाकर अपना व्यापार बढ़ाते हैं।

उपर्युक्त लाभों के अतिरिक्त देशाटन से अन्य कई लाभ भी हैं। देशाटन से दृष्टिकोण विस्तृत होता है, अनुभवों का विकास होता है, उदारता और सद्विचारों का उदय होता है, महान् लोगों से सम्पर्क होता है। देशाटन से सहनशीलता, सहानुभूति, सहयोग, मधुर भाषण आदि गुणों का विकास होता है, जो मनुष्य के जीवन में अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होते हैं।

देशाटन से हानियाँ-देशाटन की आदत पड़ने से, धन के व्यय की आदत पड़ जाती है। घुमक्कड़ लोग घूमने में ही जीवन बिता देते हैं और भौतिक जीवन की प्रगति करने के प्रति उदासीन हो जाते हैं। जलवायु की भिन्नता, मार्ग की कठिनाइयों और सांस्कृतिक मूल्यों की भिन्नता के कारण कभी-कभी जान-माल से भी हाथ धोना पड़ता है।

उपसंहार-देशाटने हमारे जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। फलतः प्रत्येक देश में पर्यटन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। पर्यटकों के लिए सुख-सुविधाओं के साधन बढ़ गये हैं। लाखों पर्यटक एक देश से दूसरे देश में पहुँचते रहते हैं। सर्वश्रेष्ठ मानव-जीवन को प्राप्त करके हमें विश्व की अनेक प्रकार की वस्तुओं को देखकर जीवन सफल करना चाहिए। यदि हमें ईश्वर की इस अनुपम सृष्टि का निरीक्षण किये बिना संसार से विदा हो गये तो मन पछताता ही रह जाएगा—

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिन्दगानी फिर कहाँ ?
जिन्दगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाँ ?

54. मेरा प्रिय खेल : क्रिकेट

सम्बद्ध शीर्षक

  • किसी क्रिकेट मैच का वर्णन [2016]
  • क्रिकेट का आँखों देखा हाल [2014]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. हमारे विद्यालय का क्रिकेट मैच,
  3. खेल के मैदान की व्यवस्था,
  4. मैच का आरम्भ,
  5. भोजनावकाश के बाद का खेल,
  6. पुरस्कार वितरण,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए शिक्षा और भोजन ही पर्याप्त नहीं हैं, वरन् इनके लिए खेलकूद भी परमावश्यक है। खेल जहाँ एक ओर मनोरंजन करते हैं, वहीं दूसरी ओर इनसे खिलाड़ियों में अनुशासन और परस्पर सद्भाव भी जाग्रत होता है। मानव के विकास में खेलों के महत्त्व को समझते हुए उनको प्रोत्साहित करने की दृष्टि से अनेक क्रीड़ा प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। आज का व्यक्ति गम्भीर और जटिल होता चला जा रहा है। उसे पुन: बालकों की भाँति उत्साही, साहसी व खुशमिजाज बनने के लिए खेलों की ओर मुड़ना चाहिए। आज सभी वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि जो स्फूर्ति खेलों से प्राप्त हो सकती है, वह किसी ओषधि से नहीं।

हमारे विद्यालय का क्रिकेट मैच–प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी नवम्बर मास में हमारे विद्यालय में अन्य खेलों के साथ-साथ क्रिकेट का आयोजन हुआ। इसमें हमारे विद्यालय की क्रिकेट टीम का मुकाबला स्थानीय एस० एस० डी० कॉलेज की क्रिकेट टीम से हुआ। हमारे विद्यालय एस०डी० इण्टर कॉलेज की क्रिकेट टीम नगर की अन्य टीमों की तुलना में बहुत सुदृढ़ है। हमारे बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों ही कुशल हैं तथा उनका क्षेत्ररक्षण बहुत चुस्त है। दूसरी टीम भी बहुत सुदृढ़ थी। खेल का आयोजन हमारे ही विद्यालय के मैदान में हुआ, जो नगर के मध्य में स्थित है। दोनों टीमों का मुकाबला बहुत रोमांचक रहा, जिसकी याद मन-मस्तिष्क में सदा ताजा रहेगी।

खेल के मैदान की व्यवस्था—यह मैच 50-50 ओवरों का था। खेल 9 बजे शुरू होना था। दोनों विद्यालय के छात्र और बहुत बड़ी संख्या में स्थानीय दर्शक वहाँ पर एकत्रित हो चुके थे। मैं तो समय से पहले ही वहाँ पहुँच गया था। खेल के आयोजन की सुन्दर व्यवस्था थी। जिला विद्यालय निरीक्षक इस मैच के मुख्य अतिथि थे। मैदान में सफेद चूने से रेखाएँ खींची हुई थीं। मैदान के चारों ओर दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। कुछ ही देर में दोनों टीमों के कप्तान भी आये। सिक्का उछालकर टॉस हुआ। हमारे विद्यालय के कप्तान ने टॉस जीता और पहले दूसरी टीम को बल्लेबाजी करने के लिए आमन्त्रित किया।

मैच का आरम्भ-खेल शुरू हुआ। हमारी टीम के तेज गेंदबाज ने खेल की पहली गेंद फेंकी। बल्लेबाज जल्दबाजी कर बैठा और गेंद उसके बल्ले का बाहरी कोना लेते हुए विकेट-कीपर के हाथों में जा । पहुँची। इस तरह हमारी टीम को पहली सफलता मिली। अगला खिलाड़ी बल्लेबाजी के लिए आया। दोनों ने बहुत तालमेल के साथ दूसरे विकेट की साझेदारी में 120 रन बनाये, जिनमें दस चौके और चार शानदार छक्के सम्मिलित थे। हमारे कप्तान के पसीने छुट रहे थे। कप्तान ने अब गेंद फिरकी गेंदबाजों को सौंपी। उन्होंने इतनी सटीक गेंदबाजी की कि बल्लेबाजों के साथ ‘तू चल मैं आता हूँ की कहावत चरितार्थ हो गयी। एक के बाद एक बल्लेबाज आउट होते चले गए। अभी बयालिस ओवर ही फेंके गये थे कि सारी टीम मात्र 204 रनों पर सिमट गयी।।

भोजनावकाश के बाद का खेल–भोजन से निवृत्त होते ही एस० एस० डी० कॉलेज के खिलाड़ी मैदान में पहुँच गये। हमारी टीम के प्रारम्भिक बल्लेबाज मैदान पर पहुँचे और खेल आरम्भ हो गया। हमारे दोनों प्रारम्भिक बल्लेबाजों ने बहुत सूझ-बूझ और गति के साथ स्कोर को 80 तक पहुँचा दिया। पन्द्रह ओवर का खेल हो चुका था। दूसरी टीम के कप्तान ने अब स्वयं गेंद सँभाली और अपने क्षेत्ररक्षक चारों ओर फैला दिये। उसने बल्लेबाजों को खुलकर खेलने के लिए ललचाया। पहली ही गेंद पर चौका लगा। अगली गेंद बल्लेबाज को चकमा दे गयी। आरम्भिक जोड़ी टूट गयी। गेंदबाजों के हौसले बढ़े और उन्होंने जल्दी-जल्दी चार विकेट ले लिये। शेष 25 ओवरों में 90 रन बनाने थे और छह विकेट हाथ में.थे। कोई मुश्किल लक्ष्य नहीं था, लेकिन कहते हैं कि क्रिकेट की हर गेंद निर्णायक हो सकती है। अब दो ओवर का खेल शेष था और जीत के लिए दस रन बनाये जाने थे। दोनों बल्लेबाजों ने आपसी तालमेल से विकेट के बीच दौड़ते हुए .1-1 रन लेना शुरू किया और पाँच रन बना लिये। क्षेत्ररक्षकों को करीब बुलाकर विपक्षी टीम के कप्तान ने उन्हें इस तरह रन बनाने से रोकना चाहा, लेकिन तभी बल्लेबाज ने स्थिति को समझते हुए गेंद को ऊपर हवा में उछाल दिया। गेंद सीमा-रेखा से बाहर हो गयी और हमारी टीम ने मैच में रोमांचक विजय प्राप्त की।

पुरस्कार-वितरण-खेल की समाप्ति पर मुख्य अतिथि ने पुरस्कार-वितरण किये। हमारी टीम के प्रारम्भिक बल्लेबाज को ‘मैन ऑफ द मैच’ घोषित किया गया और टीम के कप्तान को विजेता शील्ड प्रदान की गयी। इस प्रकार यह क्रिकेट प्रतियोगिता सम्पन्न हुई, जिसके रोमांचक क्षण आज भी मेरी स्मृति में ताजा बने हुए हैं।

उपसंहार–हम देख रहे हैं कि एशियन एवं ओलम्पिक खेलों की पदक तालिका में भारतवर्ष पिछड़ता जा रहा है। यह दयनीय स्थिति है। जनसंख्या में चीन के पश्चात् दूसरा स्थान रखने वाला, कभी हॉकी में स्वर्ण पदक विजेता रहा भारत आज कहीं नहीं जम पा रहा है और आजादी के छः दशक बाद भी खेलों के क्षेत्र में उसे निराशा ही हाथ लग रही है।

दुःख की बात है कि हम हर क्षेत्र में पिछड़े होने के प्रभाव से अभी तक मुक्त नहीं हो पाये हैं। इस स्थिति से उबरने के लिए हमें खिलाड़ियों के उचित प्रशिक्षण, निष्पक्ष चयन व ईमानदार चयनकर्ताओं की अति आवश्यकता है।

55. रोचक यात्रा का वर्णन [2009, 10, 15]

सम्बद्ध शीर्षक

  • किसी रेल यात्रा का वर्णन
  • किसी यात्रा का वर्णन [2011]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. यात्रा की तैयारी और प्रस्थान,
  3. मार्ग के दृश्य,
  4. वांछित स्थान पर पहुँचना और वहाँ के दर्शनीय स्थलों का वर्णन,
  5. वापसी,
  6. उपसंहार।।

प्रस्तावना–प्राय: हर व्यक्ति के जीवन में एक निश्चित दिनचर्या बन जाया करती है। वह एक बँधीबँधाई दिनचर्या के अनुसार कार्य करते रहने पर कभी-कभी ऊब जाता है और अपने जीवन-चक्र में बदलाव चाहता है। हर प्रकार के परिवर्तन के लिए यात्रा का अत्यधिक महत्त्व है। यात्रा अथवा नये स्थानों पर भ्रमण से व्यक्ति के जीवन में आयी नीरसता समाप्त हो जाती है और वह अपने अन्दर एक नया उत्साह पाता है। इतना ही नहीं, इन यात्राओं से व्यक्ति के अन्दर आत्मविश्वास और साहस उत्पन्न होता है। इससे विभिन्न व्यक्तियों के बीच आत्मीयता भी बढ़ती है और हमारे व्यावहारिक ज्ञान की वृद्धि होती है।

यात्रा की तैयारी और प्रस्थान-मई का महीना था। हमारी परीक्षाएँ अप्रैल में ही समाप्त हो चुकी थीं। मेरे कुछ साथियों ने आगरा घूमने का कार्यक्रम बनाया। मैंने अपने पिताजी और माताजी से इसके लिए स्वीकृति ले ली और विद्यालय के माध्यम से रियायत प्राप्त करके रेलवे के आरक्षित टिकट बनवा लिये थे। सभी साथी अपना-अपना सामान लेकर मेरे यहाँ एकत्रित हो गये। घर से सभी छात्र एक थ्री-व्हीलर द्वारा स्टेशन पहुँचे। प्लेटफॉर्म पर बहुत भीड़ थी। कुछ समय के पश्चात् गाड़ी आयी। हमने अपना सामान गाड़ी में चढ़ाया। प्लेटफॉर्म पर सामान बेचने वालों की आवाजों से बहुत शोर हो रहा था, तभी गाड़ी ने सीटी दे दी। गाड़ी के चलने पर ठण्डी हवा लगी तो सभी को राहत मिली।

मार्ग के दृश्य-हम सभी अपनी-अपनी सीटों पर बैठ चुके थे। डिब्बे में इधर-उधर निगाह घुमायी तो देखा कि कुछ लोग बैठे हुए ताश खेल रहे हैं, तो कोई उपन्यास पढ़कर मन बहला रहा है। कुछ लोग बैठे हुए ऊँघ रहे थे। मैं भी अपने साथियों के साथ गपशप कर रहा था। खिड़की से बाहर झाँकने पर मुझे पेड़-पौधे तथा खेत-खलिहान पीछे की ओर दौड़ते नजर आ रहे थे। सभी दृश्य बड़ी तेजी से पीछे छूटते जा रहे थे। गाड़ी छोटे-बड़े स्टेशनों पर रुकती हुई अपने गन्तव्य की ओर निरन्तर बढ़ती ही जा रही थी। हमने कुछ समय ताश खेलकर बिताया। साथ लाये भोजन और फल मिल-बाँटकर खाते-पीते हम सब यात्रा का पूरा आनन्द ले रहे थे।

एक स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही अचानक कानों में आवाज पड़ी कि ‘पेठा, आगरे का मशहूर पेठा’। हम सब अपना-अपना सामान सँभालते हुए नीचे उतरे।।

वांछित स्थान पर पहुँचना और वहाँ के दर्शनीय स्थलों का वर्णन–हम सभी साथी एक धर्मशाला में जाकर ठहर गये। धर्मशाला में पहुँचकर हमने मुँह-हाथ धोकर अपने को तरोताजा किया। शाम के सात बज चुके थे। इसलिए हम लोग शीघ्र ही भोजन करके धर्मशाला के आस-पास ही घूमने के लिए निकल गये। अगले दिन 11.00 बजे दिन में हम लोग सिटी बस द्वारा ताज देखने के लिए चल दिये। भारत के गौरव और संसार के गिने-चुने आश्चर्यों में से एक ताजमहल के अनूठे सौन्दर्य को देखकर हम सभी स्तम्भित रह गये। श्वेत संगमरमर पत्थरों से निर्मित ताज दिन में भी शीतल किरणों की वर्षा करता प्रतीत हो रहा था।

ताजमहल का निर्माण मुगल सम्राट् शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज महल की स्मृति में कराया था। यह एक सफेद संगमरमर के ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है। इस चबूतरे के चारों कोनों पर चार मीनारें बनी हुई। हैं। मुख्य इमारत इस चबूतरे के बीचों-बीच बनी हुई है। इमारत के ऊपरी भाग में चारों ओर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं। इस इमारत के चारों ओर सुन्दर बगीचे बने हुए हैं, जो इसके सौन्दर्य में चार चाँद लगा रहे हैं। वास्तव में यह भारतीय और यूनानी शैली में बनी अद्वितीय और अनुपम इमारत है, जिसे देखने के लिए दुनिया के विभिन्न भागों से प्रति वर्ष लाखों व्यक्ति आते हैं।

दूसरे दिन हमने आगरे को लाल किला तथा दयाल बाग देखने का कार्यक्रम बनाया। इन भवनों के अपूर्व सौन्दर्य ने हम सबका मन मोह लिया। आगरे का लाल किला सम्राट् अकबर द्वारा बनवाया गया है। इस विशाल किले को देखने के लिए वैसे तो कई दिन भी कम हैं, किन्तु हम लोगों ने जल्दी-जल्दी इसके तमाम महत्त्वपूर्ण स्थलों को देखा। यहीं से हम लोग बस द्वारा दयाल बाग पहुँच गये। यहाँ पर राधास्वामी मत वाले एक इमारत का निर्माण पिछले कई वर्षों से करवा रहे हैं, पर अभी भी यह अधूरी ही है। इस इमारत की भव्यता और सौन्दर्य को देखकर यह कहा जा सकता है कि जिस समय यह पूर्ण होगी, निश्चित ही स्थापत्य कला का एक अनुपम उदाहरण होगी।

वापसी-आगरा की आकर्षक और सजीव स्मृतियों को मन में सँजोये, पेठे और नमकीन की खरीदारी कर तथा काँच के चौकोर बक्से में बन्द ताज की अनुकृति लिये हुए हम लोग वापस लौटे। इस प्रकार हमारी यह रोचक यात्रा सम्पन्न हुई।

उपसंहार—घर लौट आने पर मैं प्रायः सोचता कि कूप-मण्डूकता के विनाश के लिए समय-समय पर प्रत्येक व्यक्ति को विविध स्थलों की यात्रा अवश्य करनी चाहिए; क्योंकि इससे कल्पना और यथार्थ का भेद समाप्त होता है और जीवन की वास्तविकता से साक्षात्कार भी होता है। आगरा की यात्रा ने मुझे ढेर सारे नवीन अनुभवों तथा प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कराया है।

56. विद्यालय का वार्षिकोत्सव [2011, 12, 13, 14, 15]

सम्बद्ध शीर्षक

  • किसी समारोह का आँखों देखा हाल
  • मेरे विद्यालय का वार्षिक समारोह
  • विद्यालय का पर्वायोजन

रूपरेखा—

  1. प्रस्तावना,
  2. उत्सव की तैयारी,
  3. मुख्य अतिथि का आगमन और उत्सव का आरम्भ,
  4. रोचक कार्यक्रम,
  5. उत्सव का समापन और मुख्य अतिथि का सन्देश,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-मानव-जीवन संघर्षों का जीवन है। समय-समय पर आयोजित उत्सव उसके जीवन में नवस्फूर्ति भर देते हैं। उसका हृदय उल्लास से भर जाता है और वह कठिनाइयों से जूझता हुआ जीवन-पथ पर आगे बढ़ता चलता है। इसी को दृष्टि में रखकर विभिन्न विद्यालयों में अनेक उत्सवों का आयोजन किया जाता है। हमारे विद्यालय में भी प्रतिवर्ष खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, यही वार्षिकोत्सव कहलाता है जो बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। विद्यालय का वार्षिकोत्सव मेरा सर्वप्रिय उत्सव रही है। मैं बहुत दिनों पहले से ही इस उत्सव पर अपने कार्यक्रम को प्रस्तुत करने की तैयारी में जुट जाता हूँ। यह उत्सव प्राय: जनवरी माह में मनाया जाता है। इसके साथ ही वार्षिकोत्सव में विद्यालय की भावी प्रगति की रूपरेखा प्रस्तुत की जाती है।

उत्सव की तैयारी-इस वर्ष 4-5-6 जनवरी को विद्यालय का वार्षिकोत्सव होना निश्चित हुआ। प्रधानाचार्य द्वारा इसकी घोषणा से सभी विद्यार्थियों में आनन्द की लहर दौड़ गयी। उत्सव प्रारम्भ होने में 20 दिन का समय शेष था। अब जोर-शोर से खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी शुरू हो गयी। कुछ छात्र लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, गोला फेंक में जुटे हुए थे तो कुछ वाद-विवाद, अन्त्याक्षरी, गीतों, नाटक आदि के पूर्वाभ्यास में। इन तैयारियों के लिए प्रधानाचार्य महोदय ने कुछ समय निर्धारित कर दिया और शेष समय में पढ़ाई नियमित रूप से जारी रखने का निर्देश दिया। सभी छात्रों में नया उत्साह और नया जोश था। विद्यालय की विधिवत् सफाई शुरू हो गयी थी।

मुख्य अतिथि का आगमन और उत्सव का आरम्भ-न जाने कब प्रतीक्षा के दिन समाप्त हुए और 4 जनवरी आ गयी, पता ही नहीं चला। इस दिन खेल-कूद की प्रतियोगिताओं का आयोजन था। मैदान हरा-भरा था। चूने की सफेदी से बनी रेखाएँ और रंग-बिरंगी झण्डियाँ मैदान की शोभा को द्विगुणित कर रही थीं। जिला विद्यालय निरीक्षक हमारे खेल-कूद कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। हमारे प्रधानाचार्य और गणमान्य अतिथि खेल के मैदान पर पहुँचे। सभी ने खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका अभिवादन किया। इसके बाद खेलकूद प्रतियोगिता आरम्भ हुई।

रोचक कार्यक्रम-खेलों की शुरुआत ने मैदान में हलचल मचा दी। भिन्न-भिन्न प्रकार के खेलों के : लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित थे। दिनभर खेल प्रतियोगिताएँ चलती रहीं। मैंने भी ऊँची कूद में भाग लिया और नया कीर्तिमान स्थापित कर खुशी से फूला न समाया। सभी कार्यक्रम बहुत सुव्यवस्थित एवं आकर्षक ढंग से सम्पादित होते रहे।

अगले दिन शाम चार बजे से विद्यालय प्रांगण में बने भव्य पण्डाल में अन्त्याक्षरी कार्यक्रम का आरम्भ हुआ। कार्यक्रम बहुत रोचक रहा। इसके बाद वाद-विवाद प्रतियोगिता शुरू हुई, जिसका विषय था-‘आज की शिक्षा-नीति का देश की प्रगति में योगदान’। इसके पक्ष-विपक्ष में वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे और जोरदार तर्क प्रस्तुत किये। विद्यालय के 12वीं कक्षा के छात्र पंकज गुप्ता ने प्रथम और निर्मल जैन ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। रात्रि के आठ बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा गया था।. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गीत, नाटक, एकांकी, पैरोडी, समूह गान आदि का आयोजन किया गया था। रात्रि के लगभग 12 बजे कार्यक्रम की समाप्ति हुई।

तीसरे दिन का उत्सव प्रदर्शनी और पुरस्कार वितरण के लिए निश्चित था। विद्यालय के बड़े हॉल में छात्रों द्वारा बनाये गये चित्र, मूर्तियों और हस्तनिर्मित अनेक कलात्मक कृतियों की प्रदर्शनी सजी हुई थी। सभी दर्शकों ने छात्रों के सुन्दर व कलात्मक प्रयासों की बहुत सराहना की। इसके बाद तीनों दिनों के कार्यक्रमों के विजेताओं और श्रेष्ठ कलाकारों को पुरस्कार वितरित किये गये। पुरस्कार समारोह के मुख्य अतिथि हमारे क्षेत्र के माननीय उपशिक्षा निदेशक महोदय थे।

उत्सव का समापन और मुख्य अतिथि का सन्देश-पुरस्कार वितरण के बाद हमारे प्रधानाचार्य ने विद्यालय की वर्षभर की प्रगति का विवरण प्रस्तुत किया और वार्षिकोत्सव की सफलता के लिए सम्बन्धित सभी अध्यापकों और विद्यार्थियों का आभार प्रकट किया।

मुख्य अतिथि ने अपने सन्देश में सर्वप्रथम अपने हार्दिक स्वागत पर आभार प्रकट किया और विद्यालय की प्रगति तथा वार्षिकोत्सव के सफल आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने विजेताओं को बधाई दी और अन्य छात्रों को भी आगामी वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।

उपसंहार–हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव बहुत सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस उत्सव पर सभी छात्रों का हृदय आनन्द-विभोर हो गया। प्रत्येक कार्यक्रम बहुत रोचक और आकर्षक था। सचमुच ऐसे उत्सवों से छात्रों की बहुमुखी प्रतिभा प्रकट होती है और उनके व्यक्तित्व के विकास में सहायता मिलती है। इसलिए इस प्रकार के उत्सवों का आयोजन प्रत्येक विद्यालय में किया जाना चाहिए।

57. मनोरंजन के साधन

सम्बद्ध शीर्षक

  • मनोरंजन के आधुनिक साधन [2014]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना : जीवन में मनोरंजन का महत्त्व,
  2. मनोरंजन के साधनों का विकास,
  3. आधुनिक काल में मनोरंजन के विविध साधन,
  4. उपसंहार।।

प्रस्तावना : जीवन में मनोरंजन का महत्त्व-जीवन में मनोरंजन, सब्जी में नमक की भाँति आवश्यक है। यह मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। यह उसे प्रसन्नचित्त बनाने की गारण्टी तथा जीवन के कटु अनुभवों को भुलाने की ओषधि दोनों ही हैं। एक नन्हा शिशु भी इसका आकांक्षी है और एक वयोवृद्ध व्यक्ति के लिए भी यह उतना ही महत्त्वपूर्ण है। बच्चे को बेवजह रोना इस बात का संकेत है कि वह उकता रहा है। यदि वृद्ध सनकी और चिड़चिड़े हो उठते हैं तो उसका कारण भी मनोरंजन का अभाव ही है।

मनोरंजन वस्तुतः हमारे जीवन की सफलता का मूल है। मनोरंजनरहित जीवन हमारे लिए भारस्वरूप बन जाएगा। यह केवल हमारे मस्तिष्क के लिए ही नहीं, शारीरिक स्वास्थ्य-वृद्धि के लिए भी परमावश्यक है। मनोरंजन के विविध रूपों-खेलकूद, अध्ययन व सुन्दर दृश्यों के अवलोकन से हमारा हृदय असीम आनन्द से भर उठता है। इससे शरीर के रक्त-संचार को नवीन गति और स्फूर्ति मिलती है तथा हमारे स्वास्थ्य की अभिवृद्धि भी होती है।

मनोरंजन के साधनों का विकास-मनोरंजन की इसी गौरव-गरिमा के कारण बहुत प्राचीन काल से ही मानव-समाज मनोरंजन के साधनों का उपयोग करता आया है। शिकार खेलना, रथ दौड़ाना आदि विविध कार्य प्राचीन काल में मनोरंजन के प्रमुख साधन थे, परन्तु आजकल युग के परिवर्तन के साथ-साथ मनोरंजन के साधन भी बदल गये हैं। विज्ञान ने मनोरंजन के क्षेत्र में क्रान्ति कर दी है। आज कठपुतलियों का नाच जनसमाज की आँखों के लिए उतना प्रिय नहीं रहा, जितना कि सिनेमा के परदे पर हँसते-बोलते नयनाभिराम दृश्य।

आधुनिक काल में मनोरंजन के विविध साधन :
(क) वैज्ञानिक साधन–सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन आदि विज्ञान प्रदत्त मनोरंजन के साधनों ने आधुनिक जनसमाज में अत्यन्त लोकप्रियता प्राप्त कर ली है। रेडियो तो मनोरंजन का पिटारा है ही इसे अपने घर में रखे सुन्दर गाने, भाषण, समाचार आदि सुन सकते हैं। टेलीविजन तो इससे भी आगे बढ़ गया है। विविध कार्यक्रमों, खेलों आदि के सजीव प्रसारण को देखकर पर्याप्त मनोरंजन किया जा सकता है।
(ख) अध्ययन-साहित्य का अध्ययन भी मनोरंजन की श्रेणी में आता है। यह हमें मानसिक आनन्द देता है और चित्त को प्रफुल्लित करता है। साहित्य द्वारा होने वाले मनोरंजन से मन की थकान ही नहीं मिटती, वरन् ज्ञान की अभिवृद्धि भी होती है।
(ग) ललित कलाएँ–संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्रकला आदि ललित कलाएँ भी मनोरंजन के उत्कृष्ट साधन हैं। संगीत के मधुर स्वरों में आत्म-विस्मृत करने की अपूर्व शक्ति होती है।
(घ) खेल-ललित कलाओं के साथ-साथ खेल भी मनोरंजन के प्रिय विषय हैं। हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट, टेनिस, बैडमिण्टन आदि खेलों से खिलाड़ी एवं दर्शकों का बहुत मनोरंजन होता है। विद्यार्थी वर्ग के लिए खेल बहुत ही हितकर हैं। इनके द्वारा उनका मनोरंजन ही नहीं होता, अपितु स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। गर्मी की साँय-साँय करती लूओं से भरे वातावरण में घर बैठकर साँप-सीढ़ी, लूडो, ताश, कैरम, शतरंज खूब खेले जाते हैं।
(ङ) अन्य साधन–कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिन्हें अभीष्ट कार्य को पूर्ण करने में ही आनन्द की प्राप्ति हो जाती है। कुछ लोग अपने कार्य-स्थलों से लौटने के बाद अपने उद्यान को ठीक प्रकार से सँवारने में ही घण्टों व्यतीत कर देते हैं। कुछ लोगों का मनोरंजन फोटोग्राफी होता है। कहीं मन-लुभावना आकर्षक-सा दृश्य दिखाई दिया और उन्होंने उसे कैमरे में कैद कर लिया। इसी से मन प्रफुल्लित हो उठा।

मेले-तमाशे, सैर-सपाटे, यात्रा-देशाटन आदि मनोरंजन के विविध साधन हैं। इनसे हमारा मनोरंजन तो होता ही है, साथ-ही-साथ हमारा व्यावहारिक ज्ञान भी बढ़ता है। राहुल सांकृत्यायनं तो देशाटन द्वारा अर्जित ज्ञान के कारण ही महापण्डित कहलाये। सन्तों ने तो हर काम को हँसते-खेलते अर्थात् मनोरंजन करते हुए करने को कहा है, यहाँ तक कि ध्यान (meditation) भी मन को प्रसन्न करते हुए किया जा सकता। है-हसिबो खेलिबो धरिबो ध्यानम्।

उपसंहार-निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जीवन में अन्य कार्यों की भाँति मनोरंजन भी उचित मात्रा में होना आवश्यक है। सीमा से अधिक मनोरंजन समय जैसी अमूल्य सम्पत्ति को नष्ट करता है। जिस प्रकार आवश्यकता से अधिक भोजन अपच का कारण बन शरीर के रुधिर-संचरण में विकार उत्पन्न करता है, उसी प्रकार अधिक मनोरंजन भी हानिकारक होता है। हमें चाहिए कि उचित मात्रा में मनोरंजन करते हुए अपने जीवन को उल्लासमय और सरल बनाएँ।

58. यातायात के नियम

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. नियम-पालन की आवश्यकता,
  3. यातायात के नियम,
  4. उपसंहार।

प्रस्तावना-हम अपने अधिकारों और स्वतन्त्रता का उपभोग तभी तक कर सकते हैं, जब तक कि वे दूसरे लोगों के अधिकारों व स्वतन्त्रता में बाधक न हों। कुछ ऐसे नियम होते हैं जिनका हमें पालन करना ही चाहिए। जब हम नियमों का पालन नहीं करते अथवा बिना सोचे-समझे काम करते हैं तब हम दूसरों के लिए असुविधा पैदा करते हैं।

इसी प्रकार यातायात के नियम हैं जो सड़क के प्रत्येक प्रयोगकर्ता को मानने चाहिए। गाड़ियों के चालकों, साइकिल सवारों तथा पैदल यात्रियों सभी को इन नियमों का पालन करना चाहिए। यदि वे उन्हें नहीं मानेंगे तब वे स्वयं और अन्य व्यक्तियों को भी खतरे में डालेंगे। यातायात के संकेत जानने भी आवश्यक हैं क्योंकि उनके न जानने पर दुर्घटनाओं का अत्यधिक खतरा रहता है।

नियम-पालन की आवश्यकता–एक दिन एक सज्जन अपनी टहलने की छड़ी को अपने हाथों में . गोल-गोल घुमाते हुए और अपने को महत्त्वपूर्ण व्यक्ति दर्शाते हुए किसी भीड़-भाड़ वाली सड़क पर टहले रहे थे। उनके पीछे आते हुए एक व्यक्ति ने आपत्ति की, “आपको अपनी टहलने की छड़ी इस तरह गोल-गोल नहीं घुमानी चाहिए।’

“मैं अपनी टहलने की छड़ी से जो चाहूँ करने के लिए स्वतन्त्र हूँ।” उन सज्जन ने तर्क दिया।

आप वास्तव में स्वतन्त्र हैं,” दूसरे व्यक्ति ने कहा, “परन्तु आपको यह मालूम होना चाहिए कि आपकी स्वतन्त्रता वहीं समाप्त हो जाती है, जहाँ तक वह मेरी स्वतन्त्रता में बाधक नहीं होती।

निश्चित रूप से हम दूसरों की स्वतन्त्रता में जानबूझकर हस्तक्षेप नहीं करते। परन्तु कभी-कभी अनजाने में हम दूसरों के कार्यों में बाधक बन जाते हैं। यह उस समय होता है जब हम कोई कार्य बिना सोचे-समझे करते हैं या उन नियमों का पालन नहीं करते जिनका हमें पालन करना चाहिए।

यातायात के नियम-यातायात के ऐसे कोई नियम नहीं हैं जो हमें बताएँ कि सभी मामलों में हमें किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए और किस प्रकार का नहीं। परन्तु कुछ मामलों में ऐसे नियम हैं। जिनका हम सबको पालन करना चाहिए। इन नियमों का उद्देश्य प्रत्येक के लिए सड़क के यातायात को सुरक्षित बनाना है। आजकल हमारे नगरों और कस्बों की सड़कें यातायात के कारण अत्यधिक व्यस्त होती चली जा रही हैं। दिन में अधिकांश समय तक सड़कें कुछ धीमे तथा कुछ तेज गति के वाहनों से भरी रहती हैं। यदि लोग यातायात के नियमों का उल्लंघन करते हैं, तो देर-सबेर दुर्घटनाएँ हो सकती हैं। पैदल चलने वालों, गाड़ियों और सड़क के प्रत्येक प्रयोगकर्ता के लिए इन नियमों को जानना आवश्यक है।

पैदल चलने वालों के लिए एक महत्त्वपूर्ण नियम है। यदि फुटपाथ है तो उन्हें फुटपाथ पर चलना चाहिए। जहाँ कोई फुटपाथ नहीं है, वहाँ पर पैदल चलने वालों को सड़क के बायीं ओर किनारे-किनारे चलना चाहिए। यदि वे इस नियम का पालन नहीं करते हैं, तो वे अपने और दूसरों के लिए भी खतरा पैदा करेंगे। एक वाहन चालक पैदल चलने वाले को बचाने के लिए अचानक ही अपने वाहन को मोड़ सकता है। और ऐसा करने में वह किसी दूसरे को टक्कर मार सकता है, अपने वाहन पर सन्तुलन खो सकता है और फुटपाथ पर अनेक लोगों को टक्कर मारकर गिरा सकता है।

सभी वाहनों को यथासम्भव अपनी बायीं ओर चलना चाहिए और सड़क का दाहिना आधा भाग विपरीत दिशा से आने वाले वाहन के लिए छोड़ देना चाहिए। भारत के समस्त भागों में यातायात का यही नियम प्रचलित है। साइकिल सवारों को सदैव सड़क के किनारे चलना चाहिए और पैदल यात्रियों अथवा वाहनों के मार्ग में कदापि बाधक नहीं बनना चाहिए। हम अक्सर दो या अधिक साइकिल-सवारों को सड़क के बीच में एक-दूसरे के बगल में जाता हुआ देखते हैं, यातायात के नियम इस बात की आज्ञा नहीं देते। जहाँ सड़क बहुत व्यस्त है, वहाँ इससे यातायात में बाधा उपस्थित होगी और दुर्घटनाएँ होंगी।

आगे जा रहे वाहन को पार करने का नियम भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। किसी भी वाहन को दूसरे वाहन से आगे निकलने के लिए दायीं ओर से जाना चाहिए अन्यथा वह उस वाहन से टकरा सकता है, जो बायीं ओर रहने का प्रयत्न कर रहा है।

जहाँ सड़कें एक-दूसरे को काटती हैं वहाँ वाहन के पहले निकलने के अधिकार के बारे में भी नियम है। ऐसे स्थानों पर, साधारणतया, एक गोल चक्कर बना रहता है। जो वाहन दायीं ओर से आ रहा है, उसे बायीं ओर से आने वाले वाहन से पहले मार्ग पाने का अधिकार है। यदि प्रत्येक चालक इस नियम का पालन करे तो गोल-चक्करों पर यातायात सुचारु रूप से चलेगा और दुर्घटनाओं से बचा जा सकेगा।

वाहनों के चालकों को सही संकेत देने में कभी भूल नहीं करनी चाहिए, अन्यथा दुर्घटना होने का खतरा बना रहेगा। दाएँ-बाएँ मुड़ने, चाल मन्दी करने और रुकने तथा दूसरी गाड़ियों को आगे निकल जाने देने के संकेत हैं। साइकिल-सवार, यह सोचकर कि ये संकेत केवल मोटर-चालकों के लिए ही महत्त्वपूर्ण हैं, प्रायः संकेत देने में लापरवाही करते हैं। परन्तु सड़क का प्रयोग करने वाले सभी व्यक्तियों को, चाहे वे साइकिल-सवार हों या मोटरचालक, सही संकेत देने चाहिए, जिससे सड़क पर चलने वाले दूसरे लोग सचेत हो जाएँ। पैदल चलने वालों को भी इन संकेतों का ज्ञान होना चाहिए, जिससे वे यह पता लगा सकें कि सड़क पर चलने वाला वाहन किधर होकर जा रहा है। जब दो मोटर-चालक रात्रि के समय विपरीत दिशाओं से आते हुए अपनी गाड़ियों के प्रकाश को मन्द कर देते हैं तो वे एक-दूसरे के कार्य में सहायक होते हैं।

इस प्रकार के सभी कार्यो में हम अपनी थोड़ी-सी स्वतन्त्रता और सुविधा का त्याग करते हैं जिससे अन्य व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता और सुविधा का आनन्द ले सकें और जीवन सबके लिए सुगमतापूर्वक चल सके।

उपसंहार–इन सभी बातों से अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सार्वजनिक सड़क का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को यातायात-नियन्त्रण कार्य पर तैनात पुलिसकर्मी की आज्ञा का पालन करना चाहिए। यह सभी नियमों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। जरा कल्पना कीजिए कि पैदल चलने वालों और तेज गति से चलने वाले वाहनों से भरी व्यस्त सड़क पर यदि पुलिसकर्मी तैनात न हो तो क्या दशा होगी? आप समझ सकते हैं। कि पुलिसकर्मी कितना महत्त्वपूर्ण हैं और आप उसके आदेश को सदैव पालन करने लगेंगे और यदि आप यह समझते हैं कि वह गलत है और आप ठीक हैं, तो भी आप उससे कभी नाराज नहीं होंगे।

59. यदि मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता [2014]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. मेरी कल्पना प्रधानाचार्य बनना,
  3. अध्यापकों पर ध्यान देना,
  4. पुस्तकालय, खेल आदि का स्तर सुधारने पर बल,
  5. विद्यालय की दशा सुधारना,
  6. शिक्षा-परीक्षा पद्धति में परिवर्तन,
  7. उपसंहार।।

प्रस्तावना-कल्पना भी क्या चीज होती है। कल्पना के घोड़े पर सवार होकर मनुष्य न जाने कहाँ-कहाँ की सैर कर आता है। यद्यपि कल्पना की कथाओं में वास्तविकता नहीं होती तथपि कल्पना में जहाँ मनुष्य क्षण भर के लिए आनन्दित होता है, वहीं वह अपने लिए कतिपय आदर्श भी निर्धारित कर लेता है। इसी कल्पना से लोगों ने नये कीर्तिमान भी स्थापित किये हैं। एडीसन, न्यूटन, राइट बंधु आदि सभी वैज्ञानिकों ने कल्पना का सहारा लेकर ही ये नये आविष्कार किये। कल्पना में मनुष्य स्वयं को सर्वगुणसम्पन्न भी समझने लगता है।

मेरी कल्पना प्रधानाचार्य बनना-मेरी कल्पना अपने आप में अत्यन्त सुखद है कि काश मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता। प्रधानाचार्य का पद गौरव एवं उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। मैं प्रधानाचार्य होने पर अपने सभी कर्तव्यों का भली-भाँति पालन करता। हमारे विद्यालय में तो प्रधानाचार्य यदा-कदा ही दर्शन देते हैं जिससे विद्यार्थी और अध्यापकगण कृतार्थ हो जाते हैं। मैं नित्य-प्रति विद्यालय आता। अपने विद्यार्थियों व अध्यापकगणों की समस्याएँ सुनता और तदनुरूप उनका समाधान करता। अध्यापकों पर ध्यान देना-सामान्यत: विद्यालयों में कुछ अध्यापक अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने ही आते हैं। वे स्वतन्त्र व्यवसाय करते हैं तथा विद्यार्थियों को पढ़ाना अपना कर्तव्य नहीं समझते। हमारे गणित के अध्यापक शेयरों का धन्धा करते हैं। मन्दी आने पर वे सारा क्रोध विद्यार्थियों पर निकालते हैं। यदि कोई विद्यार्थी उनसे प्रश्न हल करवाने चला जाता है तो वे उसकी पिटाई कर देते हैं। अंग्रेजी के अध्यापक बीमा कम्पनी के एजेन्ट हैं। वे अभिभावकों को बीमा करवाने की नि:शुल्क सलाह देते रहते हैं। अधिकांश अध्यापक ट्यूशन पढ़ाने के शौकीन हैं। वे कक्षा में बिल्कुल नहीं पढ़ाते। जो छात्र उनसे ट्यूशन नहीं पढ़ते, उन्हें वे अनावश्यक रूप से परेशान करते हैं। यहाँ तक कि उनको परीक्षाओं में भी असफल कर देते हैं। यदि मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता तो सर्वप्रथम अध्यापकों की बुद्धि की इस मलिनता को दूर करता। ट्यूशन पढ़ाने को निषेध घोषित करता तथा ट्यूशन पढ़ाने वालों को दण्डित करता। जो अध्यापक अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करते उनको विद्यालय से निकालने अथवा उनके स्थानान्तरण की संस्तुति कर देता। सभी अध्यापकों को आदर्श अध्यापक बनने के लिए येन-केन प्रकारेण विवश कर देता।

पुस्तकालय, खेल आदि का स्तर सुधारने पर बल-हमारे विद्यालय के पुस्तकालय की दशा अत्यन्त शोचनीय हैं। छात्रों को पुस्तकालय से अपनी रुचि एवं आवश्यकता की पुस्तकें नहीं मिलती। मैं विद्यालय के पुस्तकालय की दशा सुधारता। शिक्षाप्रद पुस्तकों तथा महान साहित्यकारों की पुस्तकों की पर्याप्त मात्रा में प्रतियाँ खरीदवाता। किसी भी विषय की पुस्तकों का पुस्तकालय में अभाव नहीं रहने देता और निर्धन विद्यार्थियों को नि:शुल्क पुस्तकें भी उपलब्ध कराता।।

हमारे विद्यालय में खेलों का आवश्यक सामान नहीं है। प्रधानाचार्य होने पर मैं विद्यार्थियों की आवश्यकतानुसार खेल का सामान उपलब्ध करवाता। विद्यालय की टीम के जीतने पर खिलाड़ियों को पुरस्कृत कर उनका मनोबल बढ़ाता। अपने विद्यालय की टीमों को खेलने के लिए बाहर भेजता, साथ ही अपने विद्यालय में भी नये-नये खेलों का आयोजन करता राज्यीय और अन्तर्राज्यीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करता।

विद्यालय की दशा सुधारना-मैं विद्यार्थियों से श्रमदान करवाता। श्रमदान के द्वारा विद्यालय के बगीचे में नाना-प्रकार के पेड़-पौधे लगवाता। विद्यार्थियों को पर्यावरण के विषय में सचेत करती। विद्यालय के चारों ओर खुशबूदार फूलों के पौधे लगवाता, जिससे विद्यालय का वातावरण फूलों की सुगन्ध से खुशनुमा हो जाता।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों के विषय में मेरा विद्यालय अपने क्षेत्र का सर्वोत्तम विद्यालय होता। संगीत, कला, आदि की शिक्षा की विद्यालय में समुचित व्यवस्था करवाता। प्रत्येक महीने चित्रकला व वाद-विवाद प्रतियोगिता करवाता। विद्यार्थियों के मस्तिष्क में कला के प्रति आकर्षण पैदा करता। इस प्रकार मैं अपने विद्यालय को नवीन रूप प्रदान करता।।

शिक्षा-परीक्षा पद्धति में परिवर्तन-इतना करने के उपरान्त मैं सर्वप्रथम शिक्षा पद्धति में परिवर्तन लाने पर ध्यान केन्द्रित करता। शिक्षा विद्यार्थियों के लिए सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक विकास में सहायक होती है। मैं विद्यालय में प्राथमिक शिक्षा पर तो ध्यान देता ही साथ ही व्यावसायिक प्रशिक्षण की भी सुविधा प्रदान करवाता। इस प्रकार विद्यार्थियों को शिक्षा-प्राप्ति के बाद पराश्रित नहीं रहना पड़ता। मैं अपने विद्यालय में हिन्दी को अनिवार्य विषय घोषित करता। इसमें विद्यार्थियों में राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत होती, साथ ही उनमें देश-प्रेम की भावना भी आती।

हमारे विद्यालय की परीक्षा-प्रणाली बहुत दोषपूर्ण है। परीक्षा से पहले ही विद्यार्थी अत्यधिक तनावग्रस्त हो जाते हैं। मेरे प्रधानाचार्य बनने पर विद्यार्थियों को परीक्षाओं को भूत इस तरह नहीं सताता कि उन्हें अनैतिक विधियाँ अपनाकर परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़े। वार्षिक परीक्षा के साथ-साथ आन्तरिक मूल्यांकन भी उनकी योग्यता का मापदण्ड होता। लिखित और मौखिक दोनों रूप में परीक्षा होती। शारीरिक स्वास्थ्य भी परीक्षा का एक भाग होता तथा परीक्षा छात्रों के चहुंमुखी विकास का मूल्यांकन करती।

उपसंहार–यदि मैं प्रधानाचार्य होता तो विद्यालय का रूप ही दूसरा होता। यह सब मेरी कल्पना में रचा-बसा है। यदि मैं प्रधानाचार्य बनूंगा तो अपनी सभी कल्पनाओं को साकार करूंगा, यह मेरा दृढ़ संकल्प है। मैं ऐसी सूझबूझ से विद्यालय का संचालन करूंगा कि राज्य में ही नहीं पूरे देश में मेरे विद्यालय का नाम रोशन हो जायेगा। मुझे आशा है कि भगवान मेरी इसे कल्पना को अवश्य पूरा करेगा।

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